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विंध्याचल धाम की महिमा अपरंपार : यहां दर्शन मात्र से पूरी होती है हर मनोकामना, नवरात्र में बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की भीड़

यहां दर्शन मात्र से पूरी होती है हर मनोकामना, नवरात्र में बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की भीड़
UPT | विंध्याचल धाम।

Apr 04, 2024 17:24

विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। कहा जाता है कि जो मनुष्य इस स्थान पर तप करता है, उसे अवश्य सिद्वि प्राप्त होती है। विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं।

Apr 04, 2024 17:24

Mirzapur News : मां विंध्यवासिनी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक विंध्याचल की देवी मां विंध्यवासिनी हैं। पूरे विश्व में मात्र दो ही ऐसे दार्शनिक स्थल है जहां तीन महादेवियों का दर्शन एक साथ करने को मिलता है। जो तीन पिंडी स्वरूप में भक्तों को दर्शन  देती है (महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली )के रूप में भक्तों को दर्शन देती हैं। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। 

यूपी के मिर्जापुर स्थित विंध्याचल स्थित माता विंध्यवासिनी जी का विश्व विख्यात मंदिर है। यहां भी माता विंध्यवासिनी त्रिकोण के द्वारा तीन स्वरूपों में भक्तों को दर्शन देती हैं। यह त्रिकोण पथ 14 किलोमीटर का होता है। भक्तो कों पहला दर्शन माता विंध्यवासिनी महालक्ष्मी स्वरूप में देती हैं। दूसरा त्रिकोण दर्शन अष्टभुजा मंदिर जो पहाड़ के ऊपर स्थित माता अष्टभुजा देवी हैं जो भक्तों को महासरस्वती के रूप में दर्शन देती हैं। तीसरा त्रिकोण दर्शन माता काली मंदिर है जो महाकाली स्वरूप में भक्तों को दर्शन देती हैं। 

यहां पर भक्तों का लगा रहता है तांता
इस प्रकार मिर्जापुर विंध्याचल धाम में भक्तों को माता तीन स्वरूपों में दर्शन देती हैं, जो भारत वर्ष में ये स्थान अति महत्वपूर्ण और दार्शनिक केंद्र माना जाता है। माना जाता है कि जो भी भक्त माता का त्रिकोण कर माता के तीनों स्वरूपों का दर्शन करता है उसके समस्त पाप मिट जाते हैं और उनको मोक्ष मिलता है। भक्त विंध्यधाम का दर्शन करने संपूर्ण भारत से आते हैं। वैसे तो माता के दरबार में हजारों भक्त दर्शन के लिए प्रतिदिन आते हैं। नवरात्र में माता के दरबार में लाखों भक्तों का हुजूम उमड़ पड़ता है। विंध्याचल  सहित पहाड़ों के ऊपर नीचे चहुंओर शासन-प्रशासन मुस्तैद रहते हैं। दर्शन करने आने वाले भक्तों का स्थानीय शासन-प्रशासन द्वारा काफी मदद किया जाता है। उनके रहने के लिए रैन बसेरा, शौचालय आदि की व्यवस्था कई स्थानों पर की जाती है। मुख्य मंदिर से लेकर पहाड़ के ऊपर काली खोह, अष्टभुजा माता मंदिर तक पर्याप्त पुलिस बल तैनात रहता है। पूरे नवरात्र भर विंध्याचल में माता का जयकारा गूंजता रहता है। मंदिर के चारों तरफ विंध्याचल बाजार में रौनक ही रौनक होता है। 

ये है मान्यता
विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। कहा जाता है कि जो मनुष्य इस स्थान पर तप करता है, उसे अवश्य सिद्वि प्राप्त होती है। विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता। यहां पर संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्वि प्राप्त होती है। इस कारण यह क्षेत्र सिद्व पीठ के रूप में विख्यात है। 

नवरात्र में महानिशा पूजन का होता है अपना महत्व
नवरात्र के दिनों में मां के विशेष श्रृंगार के लिए मंदिर के कपाट दिन में चार बार बंद किए जाते हैं। सामान्य दिनों में मंदिर के कपाट रात 12 बजे से भोर 4 बजे तक बंद रहते हैं। नवरात्र में महानिशा पूजन का भी अपना महत्व है। यहां अष्टमी तिथि पर वाममार्गी तथा दक्षिण मार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है। आधी रात के बाद रोंगटे खड़े कर देने वाली पूजा शुरू होती है। ऐसा माना जाता है कि तांत्रिक यहां अपनी तंत्र विद्या सिद्ध करते हैं। कहा जाता है कि नवरात्र के दिनों में मां मंदिर की पताका पर वास करती हैं ताकि किसी वजह से मंदिर में न पहुंच पाने वालों को भी मां के सूक्ष्म रूप के दर्शन हो जाएं। नवरात्र के दिनों में इतनी भीड़ होती है कि अधिसंख्य लोग मां की पताका के दर्शन करके ही खुद को धन्य मानते हैं।
 

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