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पहले संजय-राजीव, फिर सोनिया-राहुल ने लड़ा चुनाव : 2019 में स्मृति ने बिगाड़ा था कांग्रेस का खेल, अमेठी की जनता क्या फिर से करेगी मेल?

2019 में स्मृति ने बिगाड़ा था कांग्रेस का खेल, अमेठी की जनता क्या फिर से करेगी मेल?
UPT | अमेठी की जनता किससे करेगी मेल?

May 15, 2024 13:50

अमेठी और रायबरेली, ये दोनों उत्तर प्रदेश की ऐसी सीटें है, जिन्हें कांग्रेस की परंपरागत सीट माना जाता है। इन दोनों सीटों के अस्तित्व में आने के बाद से ही कुछ अपवादों को छोड़कर इन पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। अमेठी की सीट 1967 में अस्तित्व में आई।

May 15, 2024 13:50

Short Highlights
  • राजीव ने 4 बार जीता था चुनाव
  • 2014 में हुई स्मृति ईरानी की एंट्री
  • हार के बाद राहुल ने छोड़ दिया रण
Amethi News : देश में हो रहे लोकसभा चुनाव के लिए पांचवें चरण का मतदान 20 मई को होना है। इस दिन उत्तर प्रदेश की 14 सीटों पर भी वोट डाले जाएंगे, जिसमें  मोहनलालगंज, लखनऊ, राय बरेली, अमेठी, जालौन, झांसी, हमीरपुर, बांदा, फतेहपुर, कौशांबी, बाराबंकी, फैजाबाद, कैसरगंज और गोंडा शामिल हैं। इसके पहले के एपिसोड में हम मोहनलालगंज और लखनऊ की बात कर चुके हैं। आज बात अमेठी सीट की…

कांग्रेस की परंपरागत सीटों में से एक
अमेठी और रायबरेली, ये दोनों उत्तर प्रदेश की ऐसी सीटें है, जिन्हें कांग्रेस की परंपरागत सीट माना जाता है। इन दोनों सीटों के अस्तित्व में आने के बाद से ही कुछ अपवादों को छोड़कर इन पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। अमेठी की सीट 1967 में अस्तित्व में आई। तब यहां कांग्रेस के विद्याधर वाजपेयी चुनावी मैदान में उतरे। उनके सामने थे जनसंघ के गोकुल प्रसाद पाठक। मुकाबला काफी टक्कर का रहा और विद्याधर 3 हजार वोटों के अंतर से चुनाव जीत गए। इसके बाद 1971 में दोनों प्रत्याशी फिर से आमने-सामने आए। लेकिन इस बार जीत का अंतर पिछले बार की तुलना में करीब 20 गुना बढ़ गया। विद्याधर 74 हजार वोटों के अंतर से चुनाव जीते।

जब संजय गांधी मैदान में उतरे
देश में इमरजेंसी लगने के बाद जब 1977 में चुनाव हुए तो कांग्रेस की तरफ से संजय गांधी अमेठी में उतरे। लेकिन वह अपनी जीत सुनिश्चित नहीं कर पाए और जनता पार्टी के रविंद्र प्रताप सिंह से 75 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए। लेकिन 1980 में फिर से चुनाव  घोषित हो गए और संजय गांधी दोबारा चुनावी मैदान में आए। इस बार भी उनका मुकाबला जनता पार्टी के रविंद्र कुमार सिंह से था। लेकिन संजय ने बाजी पलट दी और 1.28 लाख वोटों के बड़े अंतर से चुनाव जीत गए। तब संजय गांधी को 1.86 लाख वोट मिले थे, जबकि रविंद्र प्रताप सिंह मात्र 58 हजार वोट ही बटोर पाए। संजय गांधी के लिए ये जीत ऐतिहासिक थी।

राजीव ने 4 बार जीता चुनाव
1980 में भले ही संजय गांधी ने चुनाव जीत लिया हो, लेकिन वह लंबे वक्त तक सांसद नहीं रह पाए। जून 1980 में एक विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मृत्यु हो गई। इसके बाद उपचुनाव हुए तो राजीव गांधी ने मोर्चा संभाला। उनके सामने लोकदल के शरद यादव थे। नतीजे राजीव गांधी के पक्ष में गए और उन्होंने चुनाव जीत लिया। राजीव गांधी को 2.58 लाख वोट मिले। इसके बाद राजीव ने 3 बार फिर से अमेठी की सीट जीती। 1984 में राजीव के सामने संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी मैदान में थीं। मेनका इस चुनाव में निर्दलीय लड़ रही थीं। लेकिन वह जीत नहीं पाईं और राजीव गांधी ने 3.65 लाख वोट पाकर जीत हासिल कर ली। इसके बाद 1989 में नौवीं लोकसभा के चुनाव हुए तो राजीव गांधी के सामने जनता दल ने महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी को टिकट दिया। इस चुनाव में बसपा से खुद कांशीराम चुनाव लड़ने उतरे। लेकिन राजीव के आगे किसी की नहीं चली और उन्होंने 2 लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल कर ली। 1991 में भाजपा मैदान में उतरी। कांग्रेस के राजीव गांधी और भाजपा के रविंद्र प्रताप के बीच कड़े मुकाबले की उम्मीद थी। लेकिन अभी लोकसभा चुनाव के सारे चरण पूरे भी नहीं हुए थे कि राजीव गांधी की 21 मई 1991 को हत्या कर दी गई। हालांकि बाद में जारी नतीजों के मुताबिक राजीव ने 1.87 लाख वोट पाकर एकतरफा मुकाबला जीत लिया था। लेकिन उनकी हत्या हो जाने के कारण उपचुनाव कराए गए।

भाजपा ने एक बार जीती सीट
राजीव गांधी की मौत के बाद कांग्रेस को एक ऐसे उम्मीदवार की तलाश थी, जो गांधी परिवार का वफादार भी हो और कांग्रेस की विरासत को संभाल कर भी रख पाए। राजीव गांधी के बेहद करीबी माने जाने वाले सतीश शर्मा इसके लिए सबसे उम्दा व्यक्ति थे। अंतत: 1991 के उपचुनाव में मुकाबला कांग्रेस के सतीश शर्मा और भाजपा के एमएम सिंह के बीच हुआ। सतीश शर्मा गांधी परिवार की उम्मीदों पर खरे उतरे और 99 हजार वोटों के अंतर से मुकाबला जीत लिया। 1996 में जब फिर चुनाव हुए, तो सतीश शर्मा दोबारा कांग्रेस के टिकट पर उतरे। उनके सामने भाजपा के राजा मोहन सिंह थे। मगर सतीश शर्मा में फिर यह मुकाबला 40 हजार वोटों के अंतर से जीत लिया। अब बारी भाजपा की थी। 1998 के चुनाव में सतीश शर्मा भाजपा के संजय सिंह से 23 हजार वोटों से हार गए।

सोनिया का हुआ पदार्पण
भाजपा की जीत के बाद कांग्रेस को यह एहसास हो गया कि उसे अब सतीश शर्मा से भी ज्यादा मजबूत कैंडिडेट की जरूरत है। ऐसे में सोनिया गांधी ने मोर्चा संभाला। 1999 का मुकाबला हुआ और सोनिया गांधी ने संजय सिंह को 3 लाख से ज्यादा वोटों के बड़े मार्जिन से चुनाव हरा दिया। इसके बाद 2004 में सोनिया खुद रायबरेली चली गईं और अमेठी की सीट अपने बेटे राहुल गांधी को दे दी। ये राहुल का पहला चुनाव था। उनके सामने बसपा ने चंद्र प्रकाश मिश्रा और भाजपा के राम विलास वेदांती को उतारा। लेकिन राहुल ने 2.9 लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर ली। 2009 में यह मार्जिन और बढ़ा। 2009 में राहुल के सामने बसपा के आशीष शुक्ला और भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह थे। लेकिन ये दोनों कोई खास कमाल नहीं दिखा सके और राहुल गांधी ने 3.7 लाख वोटों के बड़े अंतर में मैदान जीत लिया।

2014 में हुई स्मृति ईरानी की एंट्री
जब 2014 में सोलहवीं लोकसभा के चुनाव हुए, तो देश में नरेंद्र मोदी की लहर थी। भाजपा ने अमेठी के लिए स्मृति ईरानी को खड़ा किया। राहुल गांधी और कांग्रेस आश्वस्त थे कि इस चुनाव में भी पिछली सभी बार की तरह भी राहुल भारी अंतर से जीत जाएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। राहुल गांधी जीते जरूर, लेकिन केवल 1 लाख वोटों के अंतर से। जीतने के बाद राहुल तो अमेठी से चले गए, लेकिन स्मृति ने अपना ठिकाना वहीं बना लिया। इसका नतीजा 2019 में दिखा। तब तक कांग्रेस को भी समझ आ गया था कि इस बार का मुकाबला आसान नहीं होने वाला है। इसलिए राहुल गांधी ने अमेठी के साथ-साथ वायनाड से भी नामांकन भरा। नतीजे घोषित हुए तो कांग्रेस का गढ़ उनके हाथ से छिन चुका था। स्मृति ईरानी ने 55 हजार वोटों के अंतर से चुनाव जीत लिया था। इस चुनाव में स्मृति ईरानी को 4.68 लाख वोट मिले थे, जो पिछले बार से 15 फीसदी ज्यादा थे।

2024 में राहुल ने छोड़ दिया रण
2024 के चुनाव से पहले राजनीतिक रणनीतिकार ये अंदाजा लगा रहे थे कि इस बार कांग्रेस अपने गढ़ को वापस पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देगी और राहुल गांधी व स्मृति ईरानी के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिलेगी। कांग्रेस ने अंतिम समय तक सस्पेंस रखा और जब घोषणा की, तो अमेठी से किशोरी लाल शर्मा को मैदान में उतार दिया। राहुल गांधी रायबरेली से प्रत्याशी बनाए गए और अमेठी में स्मृति ईरानी बनाम राहुल गांधी की जंग देखने का सपना कई लोगों के लिए अधूरा ही रह गया। सियासी रणनीतिकार मानते हैं कि कांग्रेस ने इस बार स्मृति ईरानी के लिए एक तरह का वॉकओवर दे दिया है। किशोरी लाल शर्मा भले ही अमेठी की नब्ज पहचानते हों, लेकिन ये सोचने वाली बात है कि अगर राहुल गांधी जैसा बड़ा चेहरा अमेठी की सीट नहीं बचा पाया, तो किशोरी लाल क्या ही कर पाएंगे। एक गलती कांग्रेस नेतृत्व ने भी की। 2019 में राहुल और स्मृति के बीच वोटों का अंतर मात्र 55 हजार था। यह अंतर इतना बड़ा भी नहीं था कि राहुल इसे 2024 में संभाल न सकें। बशर्ते उन्हें इसके लिए अमेठी में जाकर अगले 5 सालों के लिए जूझना पड़ता। लेकिन वह 5 सालों में मात्र दो बार ही अमेठी गए। 2024 के चुनाव से पहले ही राहुल और कांग्रेस ने अपनी हार मान ली थी।

किसके पक्ष में नतीजे जाने की उम्मीद?
अगर अमेठी का जातिगत समीकरण देखें तो यहां सबसे अधिक 34 फीसदी ओबीसी मतदाता हैं। इसके बाद 26 फीसदी दलित, 20 फीसदी अल्पसंख्यक, 18 फीसदी ब्राह्मण और 12 फीसदी क्षत्रिय वोटर हैं। किशोरी लाल शर्मा खत्री ब्राह्मण हैं और अमेठी के जातीय समीकरण में पूरी तरह फिट बैठते हैं। कहते हैं कि वह पिछले 20 साल से अमेठी की नब्ज पकड़ रहे हैं। लेकिन स्मृति ईरानी उनसे भी दो कदम आगे हैं। उन्होंने एक रैली के दौरान कह दिया है कि अमेठी के लोग जाति के नाम पर नहीं, जिम्मेदार नागरिक के तौर पर वोट दें। स्मृति ने अमेठी की जनता से वादा किया था कि अगर वह 2019 में जीत गईं, तो अमेठी में ही अपना घर बनवाकर रहेंगी। 2024 के चुनाव से पहले स्मृति ने धूमधाम से गृह प्रवेश कर लिया। जाहिर है कि अमेठी की जनता भी ये सब कुछ देख रही है और अंतिम फैसला सोच-समझकर ही लेगी। हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर स्मृति ईरानी के सामने 2024 में राहुल गांधी होते, तो नतीजा कुछ और होने की उम्मीद भी थी, लेकिन किशोरी लाल शर्मा के आने से नतीजे एक तरह से स्पष्ट ही हो गए हैं। वैसे भी 4 जून को नतीजे सारी कहानी बयां कर ही देंगे।

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