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यूपी की सियासत : नवाबों के शहर लखनऊ में किसका चल पाएगा सिक्का, बदलेगा रिवाज या फिर आएगी भाजपा

 नवाबों के शहर लखनऊ में किसका चल पाएगा सिक्का, बदलेगा रिवाज या फिर आएगी भाजपा
UPT | Loksabha Election 2024

May 15, 2024 19:31

इस बार भी भाजपा ने लगातार तीसरी बार राजनाथ सिंह को टिकट दिया है।  लखनऊ सीट पर जीत दर्ज कर रहे भाजपा के उम्मीदवार और देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का मुकाबला इस बार सपा के रविदास मेहरोत्रा से है...

May 15, 2024 19:31

Short Highlights
  • लखनऊ से रक्षा मंत्री बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में है
  • राजनाथ सिंह के सामने है इंडिया गठबंधन से रविदास मेहरोत्रा
  • लखनऊ सीट पर पिछले 33 साल से भाजपा का कब्जा रहा है
  •  20 मई को पांचवे चरण में यहां चुनाव होना है

 

 

 

Lucknow News : लखनऊ। सुनते ही आपके मन में  सबसे पहले आपके मन में क्या आता है ? शहर अपनी खास नज़ाकत, तहजीब, दशहरी आम के बाग़, चिकन की कढ़ाई। गोमती नदी के किनारे बसा यह इलाका नवाबों का शहर के रूप में भी जाना जाता है। जितनी मजबूत और मशहूर इस शहर की सांस्कृतिक विरासत है उतनी ही राजनीतिक भी। लखनऊ लोकसभा सीट खास और अहम है। अहम इसलिए भी क्योंकि यहां से खुद रक्षा मंत्री बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में है। उनके सामने है इंडिया गठबंधन से रविदास मेहरोत्रा। बता दें 20 मई को पांचवें चरण में यहां चुनाव होना है। 

लखनऊ पर भाजपा का रहा कब्जा
इस सीट पर पिछले 33 साल से भाजपा का कब्जा रहा है। लखनऊ सीट को बीजेपी का गढ़ माना जाता है। जब पहली बार राजनाथ सिंह यहां से चुनावी मैदान में उतरने की कोशिश कर रहे थे तो काफी दिक्कत भी आई क्योंकि यहां से सांसद लालजी टंडन बार बार कह रहे थे कि वह लखनऊ नहीं छोड़ेंगे। रूठे लालजी टंडन को मनाया गया। फिर राजनाथ यहां से चुनाव लड़े। यह सीट खास इसलिए भी है क्योंकि यह अटल विहारी बाजपेयी की विरासत वाली सीट मानी जाती है। वह यहां से एक दो बार नहीं बल्कि 1990 के दशक से 2004 तक लगातार 5 बार जीते और सांसद बने। प्रधानंतमंत्री तक बने। हां यह भी सच है कि वह तीन बार यहां से चुनाव हारे भी। 

32 लाख 90 हजार से अधिक हैं वोटर्स
यहां की बिरयानी, कबाब और कोरमा, जितना मुहं का स्वाद बढ़ाती है उतना यहां से चुने सांसद देश की राजनीति का भी जायका बढ़ाते है। लखनऊ लोकसभा सीट में लखनऊ की 5 विधानसभा सीटें आती हैं। जिसमें लखनऊ पूर्वी, लखनऊ पश्चिम, लखनऊ मध्य, लखनऊ उत्तरी और कैंट विधानसभा शामिल हैं। वहीं अगर इन सभी जगहों पर वोटरों की संख्या की बात करें तो करीब 32 लाख 90 हजार से अधिक हैं। इसमें अगर जातिगत आधार की बात करें तो सबसे ज्यादा सामान्य और मुस्लिम समाज के मतदाता हैं। जिसमें ब्राह्मणों की संख्या अधिक है। इसके बाद मुस्लिम आबादी है, जिसमें शिया की संख्या ज्यादा है। फिर वैश्य समाज के वोटर आते हैं। इस सीट पर दलित और ओबीसी वोटर्स की संख्या सामान्य और मुस्लिम वर्ग की तुलना में बेहद कम है। 

पहले आम चुनाव में अस्तित्व में नहीं था लखनऊ सीट 
लखनऊ के चुनावी इतिहास की ओर गौर करें तो आपको जानकर हैरानी होगी कि पहले आम चुनाव में लखनऊ नाम से कोई लोकसभा सीट अस्तित्व में था ही नहीं। 1951-52 में जब देश में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए, तब उत्तर प्रदेश में लखनऊ जिला- बाराबंकी जिला और लखनऊ जिला मध्य नाम से दो सीटें थीं। 

कब कौन जीता 
  • लखनऊ जिला मध्य सीट से कांग्रेस की विजय लक्ष्मी पंडित जीती। विजय लक्ष्मी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की बहन थीं। वहीं, लखनऊ जिला- बाराबंकी जिला सीट से कांग्रेस की गंगा देवी को जीत मिली थी।  
  • 1953 में विजय लक्ष्मी पंडित के इस्तीफा देने के बाद लखनऊ जिला मध्य सीट पर उप चुनाव हुए थे। 1954 में हुए इस उप-चुनाव में नेहरू परिवार से संबंध रखने वालीं श्योराजवती नेहरू जीतीं थीं।
  • साल 1957 के  ही वह लोकसभा चुनाव थे जब लखनऊ लोकसभा सीट अस्तित्व में आई। मुकाबला भले ही सीट पर पहला था लेकिन दिलचस्प था। भारतीय जनसंघ की टिकट पर अटल बिहारी वाजपेयी उतरे तो कांग्रेस ने पुलिन बिहारी बनर्जी को उम्मीदवार बनाया। नतीजे सामने आए तो अटल को 12,485 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।  
  • साल 1962 में भी कांग्रेस ने लखनऊ सीट से अपनी लड़ाई और जीत दोनों बरकरार रखी।  यहां से एक बार फिर जन संघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को हार का सामना करना पड़ा। इस बार कांग्रेस के बीके धवन ने अटल को 30,017 वोट से हराया। 
कांग्रेस के हार और जीत का दौर 
  • 1967 के लोकसभा चुनाव में स्थिति बदली। इस बार लखनऊ सीट कांग्रेस के हाथ से फिसल कर  निर्दलीय उम्मीदवार आनंद नारायण मुल्ला के झोली में जा गिरी। नारायण मुल्ला ने कांग्रेस प्रत्याशी वीआर मोहन को 20,972 मतों से हरा दिया। 
  • साल 1971 के लोकसभा चुनाव में जब इस सीट से कांग्रेस ने गांधी-नेहरू परिवार से संबंध रखने वाली शीला कौल को अपना उम्मीदवार बनाया। तो,शीला ने जनसंघ के पुरषोत्तम दास कपूर को 1,19,201 वोटों से हराया था। ये वही शीला कौल थीं जो बाद में रायबरेली से भी जीतकर लोकसभा पहुंचीं। 
  • साल 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को बाकी कई सीटों की तरह ही लखनऊ सीट पर भी हार का मुंह देखना पड़ा। 1977 में यहां से भारतीय लोकदल के नेता हेमवती नंदन बहुगुणा ने कांग्रेस की शीला कौल को 1,65,345 वोटों के बड़े अंतर से हरा दिया।
कांग्रेस की जबरदस्त वापसी 
साल 1980 के चुनाव से एक बार फिर राजनीति में बड़ा मोड़ आया। कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी की। पार्टी की प्रत्याशी शीला कौल ने जनता पार्टी के महमूद बट को 30,382 मतों से शिकस्त दी। साल 1984 में हुए चुनाव में भी कांग्रेस की तरफ से उतरीं शीला कौल ने जीत हासिल की। इस बार उन्होंने लोक दल के उम्मीदवार मोहम्मद यूनुस सलीम को 1,22,120 मतों के बड़े अंतर से परास्त किया।

 नबाबों के शहर ने सब को जांचा, परखा 
साल 1989 के चुनाव में एक बार फिर पाशा पलटा और एक बार फिर लखनऊ सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई। इससे यह साबित होता है कि नवाबों के शहर ने सब को जांचा, परखा और मौका भी सब को दिया। इस चुनाव में जनता दल के मांधाता सिंह ने जीत अर्जित की, जिन्होंने कांग्रेस के दाऊजी को 15,296 को मतों से हराया।

 नब्बे का दशक और बीजेपी का दौर
इस चुनाव में लखनऊ लोकसभा सीट का मुकाबला सुर्खियों में रहा। इस बार के चुनावी रण में भारतीय जनता पार्टी दस्तक देती है और चेहरे के रूप में पेश करती है अटल बिहारी वाजपेयी को। 29 साल बाद लखनऊ की सियासत में अटल वापसी करते हैं। इससे पहले वह 1957 और 1962 में जनसंघ की टिकट पर यहां से चुनाव लड़ चुके हैं। लेकिन जीते नहीं हैं। 1991 के लोकसभा चुनाव में दिग्गज भाजपा नेता ने अपनी पिछली दो हार का बदला लेते हुए कांग्रेस के उम्मीदवार रंजीत सिंह 1,17,303 वोटों के बड़े अंतर से हराया। 
1996 के लोकसभा चुनाव में भी लखनऊ सीट का मुकाबला सुर्खियों में रहा। बीजेपी से फिर एक बार अटल चुनावी मैदान में थे और उनके सामने थे समाजवादी पार्टी से अभिनेता राज बब्बर। इस चुनाव में अटल ने राज बब्बर को 1,17,303 वोटों के बड़े अंतर से हराया। 

इस जीत के साथ 16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हैं। हालांकि, महज 13 दिनों में ही उनकी सरकार गिर जाती है। दो साल के भीतर देश को दो और प्रधानमंत्री मिलते हैं, लेकिन लोकसभा का कार्यकाल पूरा नहीं हो पाता। 1998 आते-आते नए सिरे से चुनाव की नौबत आ जाती है।
 
साल 1998 के चुनाव में भी लखनऊ सीट से भाजपा के सबसे बड़े चेहरे और तत्कालीन सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ही उतरते हैं। उनके सामने होते हैं सपा की तरफ से मुजफ्फर अली। लेकिन जीत इस बार भी अटल बिहारी वाजपेयी की ही होती है।  

 1998 के चुनाव के बाद एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हैं। इस बार 13 दिन नहीं बल्कि 13 महीने तक सरकार चलाते हैं। 13 महीने बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर जाती है। नए सिरे से फिर चुनाव होते हैं। 1999 में हुए इन चुनावों में भी लखनऊ से अटल बिहारी वाजपेयी ही भाजपा के उम्मीदवार होते हैं। लगातार चौथी बार अटल बिहारी को यहां से जीत मिलती है। इस बार उनका मुकाबला होता है कांग्रेस के डॉ. कर्ण सिंह से जिन्हें वह 1,23,624 वोट से हरा देते हैं। 13 अक्तूबर 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेते हैं।   

 2004 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ सीट से लगातार पांचवीं बार जीतते हैं। इस चुनाव में उन्होंने सपा की मधु गुप्ता को 2,18,375 मतों से हराया था। 2009 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ से भाजपा ने वरिष्ठ नेता लालजी टंडन को उतारा। इस चुनाव में टंडन ने कांग्रेस की तरफ से उतरीं रीता बहुगुणा जोशी को 40,901 वोट से शिकस्त दी। ये इस सीट पर भाजपा की लगातार छठी जीत थी। 

2014 के लोकसभा चुनाव, में बीजेपी ने प्रदेश की 80 में से 71 सीटों पर जीत दर्ज की। इन 71 सीटों में से एक सीट लखनऊ भी थी। भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह इस सीट से चुनाव मैदान में उतरे थे। उन्होंने सपा की तरफ से उतरीं रीता बहुगुणा जोशी को 2,72,749 वोट के बड़े अंतर से परास्त किया।

2019 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा की तरफ से राजनाथ सिंह उम्मीदवार थे। वहीं, सपा ने अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी और अभिनेत्री पूनम सिन्हा को मैदान में उतारा। इस चुनाव में राजनाथ सिंह को जीत मिली। उन्होंने सपा उम्मीदवार को 3,47,302 वोटों से हराया।

क्या इस बार बदलेगा लखनऊ का रिवाज 
इस बार भी भाजपा ने लगातार तीसरी बार राजनाथ सिंह को टिकट दिया है। लखनऊ सीट पर जीत दर्ज कर रहे भाजपा के उम्मीदवार और देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का मुकाबला इस बार सपा के रविदास मेहरोत्रा से है। यह वहीं रविदास मेहरोत्रा है जो पहली बार 1989 में जनता दल के टिकट पर लखनऊ पूर्वी सीट से विधायक बने, साल 2012 में लखनऊ मध्य से वह दूसरी बार चुने गए, 2012 में सपा सरकार में मंत्री बने, साल 2017 का चुनाव हारे और फिर 2022 में विधायक बने। देखना दिलचस्प होगा कि 33 सालों का लखनऊ का रिवाज बदलेगा या फिर इस बार भाजपा आएगी।

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