चंदौली में मंगलवार को नहाय खाय की परंपरा से छठ पूजा का शुभारंभ हुआ,जिसके बाद नगर में सूर्य देव की सवारी के प्रतीक सात घोड़ों को मानसरोवर तालाब से छोड़ा गया। ये घोड़े नगर के विभिन्न इलाकों में भ्रमण करते हैं और विशेष रूप से उन घरों तक पहुंचते हैं जहां छठ का व्रत करने वाली महिलाएं रहती हैं।
छठ महापर्व : चंदौली में नहाय खाय की परंपरा के साथ शुरू हुई पूजा, मानसरोवर तालाब से छोड़े गए सूर्य देव की सवारी के प्रतीक सात घोड़े
Nov 05, 2024 21:27
Nov 05, 2024 21:27
सूर्य मंदिर में घोड़ों की विशेष पूजा-अर्चना की
दीनदयाल नगर स्थित मानसरोवर तालाब के पास सूर्य मंदिर में इन घोड़ों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के बाद घोड़ों को पूरे नगर में छोड़ा जाता है, और ये घोड़े गलियों में घूमते हुए छठ व्रती महिलाओं के घरों तक पहुंचते हैं। महिलाएं इन घोड़ों का स्वागत करती हैं, उनकी आरती उतारती हैं, और उन्हें चना और गुड़ खिलाकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर सूर्य देव की सवारी का नगर भ्रमण उस स्थान को पवित्र बना देता है, जहां ये घोड़े जाते हैं।
सूर्य देव के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है यह पर्व
छठ पूजा समिति के अध्यक्ष कृष्णा गुप्ता ने बताया कि यह परंपरा सूर्य देव के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है और इसे निभाने से व्रती महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। दिवाली के छह दिन बाद मनाया जाने वाला यह पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य उपासना का यह पर्व मनाया जाता है, और श्रद्धालुओं का मानना है कि इस पूजा से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं तथा उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
डाला छठ के मौके पर सूर्य देव के घोड़ों के नगर भ्रमण की परंपरा न केवल श्रद्धालुओं की आस्था को प्रकट करती है बल्कि इसे देखने के लिए लोगों में विशेष उत्साह भी रहता है। नगरवासियों का मानना है कि इन घोड़ों की पूजा करने से उनका व्रत सफल होता है और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।
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