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गाज़ीपुर: म्योरपुर की खादी सालाना 15 लाख मीटर बनती है, बुनकरों की कमी बाधा

म्योरपुर के गोविंदपुर से हर साल 15 लाख मीटर से अधिक खादी जाती है; गांधी जयंती पर खरीद-फरोख्त और भी बढ़ जाती है।

गाज़ीपुर: म्योरपुर की खादी सालाना 15 लाख मीटर बनती है, बुनकरों की कमी बाधा
फोटो: अमर उजाला

गाज़ीपुर। जिले के म्योरपुर क्षेत्र के गोविंदपुर में खादी का कारोबार चार दशकों से चलता आ रहा है और यहां से हर साल 15 लाख मीटर से अधिक खादी अन्य जिलों तक भेजी जाती है। यह कारोबार बड़े ब्रांडों की चमक के बिना ग्रामीण स्तर पर चलता है और हाल के वर्षों में खादी की मांग करीब 25 फीसदी बढ़ी है।

यहां करीब 50 परिवार इस धंधे से सीधे जुड़े हैं और बीजपुर व बभनी के बुनाई केंद्रों से 38 महिलाएं बुनकारी संभाल रही हैं। तैयार खादी वाराणसी और गोरखपुर समेत पूर्वांचल के जिलों तक पहुंचती है। कभी यह चंडीगढ़ तक भी जाती थी, पर उपभोक्ता पसंद बदलने से वह बाजार कम हो गया।

उत्पादन की चुनौतियां

प्रबंधन कहते हैं कि उत्पादन बढ़ाने में आधुनिक उपकरणों की कमी और कुशल बुनकरों का अभाव सबसे बड़ी बाधा है। फिलहाल सेमी ऑटोमेटिक करघों पर ज्यादा मेहनत लगती है, इसलिए विस्तार में रुकावट आ रही है। बिक्री फसल कटने और गांधी जयंती के आसपास तेज होती है, क्योंकि गांवों में किसानों की आय और त्योहारों के समय खरीदारों की रुचि बढ़ जाती है।

वनवासी सेवा आश्रम की संचालक शुभा प्रेम ने कहा, “खादी सिर्फ वस्त्र नहीं, बल्कि संस्कृति है।” उन्होंने आगे कहा, “यह बड़े ब्रांडों के मुकाबले सस्ती और आरामदायक भी है। ढाई सौ रुपये मीटर से कम कीमत में भी खादी उपलब्ध है।”

खादी के संवर्धन के लिए ग्रामोद्योग विभाग प्रशिक्षण, फैशन शो और जागरूकता कार्यक्रम चला रहा है। जिला ग्रामोद्योग अधिकारी गौतम त्रिपाठी ने बताया, “खादी और इसके धंधे की तरफ लोगों को जुड़ाव बढ़े इसके लिए लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है।” प्रबंधन का मानना है कि यदि आधुनिक उपकरण और बुनकर मिल जाएं तो उत्पादन और बाजार दोनों बढ़ सकते हैं।

गांधी की स्मृति

गाजीपुर में महात्मा गांधी की 2 अक्टूबर 1929 की सैदपुर यात्रा भी लोकजीवन से जुड़ी यादें जिंदा रखती है। साहित्य भूषण डॉ. इंदीवर (78) बताते हैं कि गांधी ने चरखा संघ का उद्घाटन शांति कुटीर से बूढ़े महादेव मंदिर तक जाकर किया था और वहां महिलाओं ने हाथ से बने खादी वस्त्र पर लिखा मांग पत्र उन्हें सौंपा था। उस समय लोगों ने उनके लिए 500 रुपये की सहयोग राशि भी दी थी।

स्थानीय बुनकर और आश्रम के लोग चाहते हैं कि खादी को गांव और शहर दोनों में ब्रांड के रूप में प्रचार मिले ताकि रोजगार भी बढ़े और सांस्कृतिक विरासत बची रहे।

स्रोत: अमर उजाला

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Vikas Kumar

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कई वर्षों से समाचार, योजना, रोजगार इत्यादि मामलों से जुड़े कार्यों में संलग्न।