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रामपुर: करीब ढाई सौ साल पुरानी नवाबी परंपराएं शहर की गलियों में जिंदा

शहर के महल, सराय और पुरानी तहसील जैसे इलाकों में आज भी नवाबी खानपान, शायरी और स्थापत्य की खुशबू मिलती है, कई रस्में अब केवल याद बनकर रह गई हैं।

रामपुर: करीब ढाई सौ साल पुरानी नवाबी परंपराएं शहर की गलियों में जिंदा
फोटो: अमर उजाला

रामपुर। शहर की गलियों में चलते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि वक्त यहीं थम सा गया है। पुरानी हवेलियां, दरवाजे और दीवारें नवाबी स्थापत्य की कहानियां बयाँ करती हैं और कुछ बुजुर्गों की जुबां पर उर्दू के पुराने अल्फाज की मिठास आज भी सुनाई देती है।

रामपुर की रियासत पर करीब ढाई सौ साल तक नवाबों ने शासन किया। इस दौरान बने महल, सराय और सार्वजनिक जगहें आज भी शहर की पहचान हैं। खानपान से लेकर संगीत और शायरी तक नवाबी दौर का असर यहाँ की आबोहवा में गहरा है।

कहाँ दिखती हैं परंपराएं

शहर के कई पुरानी इलाकों में नवाबी रवायतें अभी भी कायम हैं। इन इलाकों में महल सराय, पान दरीबा, कटरा जलालउद्दीन, सराफा बाजार, बाजार नसरुल्ला खां, चाकू बाजार और पुरानी तहसील शामिल हैं। मदरसा कोहना, लाल मस्जिद, बजरिया मुल्ला जरीफ, अखाड़ा सोहराब खां और पुराना गंज भी उन जगहों में हैं जहाँ विरासत झलकती है।

  • महल सराय
  • पान दरीबा
  • कटरा जलालउद्दीन
  • सराफा बाजार, बाजार नसरुल्ला खां
  • चाकू बाजार, पुरानी तहसील, मदरसा कोहना
  • लाल मस्जिद, बजरिया मुल्ला जरीफ, अखाड़ा सोहराब खां
  • पुराना गंज, मंगल की बाजार, पांच कब्रे, बिलासपुर गेट
  • दोमहला रोड, पीर की पैठ, घेर नज्जू खां

रामपुर के खानपान की परंपरा भी खास रही है। पुराने परिवारों में आज भी कुछ व्यंजन पीढ़ी दर पीढ़ी बनते हैं। इतिहासकार महेंद्र सक्सेना कहते हैं, “पहले किसी खास मौके पर बनने वाले व्यंजन सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि मेहमान नवाजी और सामाजिक रिश्तों का हिस्सा होते थे।” बड़े दस्तरख्वानों पर परिवार और मेहमान एक साथ बैठते थे, जो अब सीमित दिखता है।

समय के साथ कई रसम रीतें और व्यंजन लुप्त हो रहे हैं। पुराने खानसामों के हाथों के व्यंजन अब घरों से गायब होते जा रहे हैं। कुछ होटल और रेस्तरां उन स्वादों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, पर पारंपरिक विधियों का समय और मेहनत नई पीढ़ी के रोजमर्रा के रसोई से दूर कर गया है।

क्या बचा है और आगे क्या होगा

पुरानी इमारतों की हालत कई जगह खराब है, फिर भी नाम और पहचान जिंदा हैं। मुशायरे और साहित्यिक आयोजन होते हैं, पर पहले जैसा नियमित माहौल कम नज़र आता है। परंपराएं पूरी तरह नहीं टूटीं हैं; उनका स्वरूप बदल चुका है और भविष्य में संरक्षण व जागरूकता पर निर्भर करेगा कि ये रीतें कितनी लंबे समय तक टिक पाती हैं।

स्रोत: अमर उजाला

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Vikas Kumar

Vikas Kumar

कई वर्षों से समाचार, योजना, रोजगार इत्यादि मामलों से जुड़े कार्यों में संलग्न।