सहारनपुर। कांग्रेस में सांसद इमरान मसूद का कद बढ़ने के साथ उनकी भूमिका अब बदल गई है और उन्हें प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। यह जिम्मेदारी ऐसे समय मिली है जब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ तेज हो रही हैं।
इमरान के समक्ष तीन बड़े मोर्चे हैं जिन पर उनकी परीक्षा उतनी ही अहम मानी जा रही है। पहला मोर्चा पश्चिमी यूपी में कांग्रेस को मजबूत करना है। दूसरा मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी व्यक्तिगत पकड़ का परीक्षण है और तीसरा सपा के साथ गठबंधन में कांग्रेस की हिस्सेदारी तय कराना है।
क्षेत्रीय प्रभाव और संगठनात्मक चुनौती
इमरान की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत पश्चिमी यूपी में बताई जाती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर से जीत के बाद उनका प्रभाव और बढ़ा है। अब कांग्रेस ने उन्हें प्रदेश संगठन में जिम्मेदारी देकर पश्चिमी यूपी से बाहर भी भूमिका दे दी है।
संगठनात्मक रूप से काम आसान नहीं है। कांग्रेस प्रदेश में लंबे समय से कमजोर संगठन और सीमित चुनावी उपस्थिति की समस्या से जूझती आई है। नई टीम में ब्राह्मण, मुस्लिम, ओबीसी और अनुसूचित जाति के प्रतिनिधित्व का संतुलन रखा गया है, जिसे मजबूत करना होगा।
मुस्लिम मतदाताओं की मौजूदगी कुछ तहसीलों में खास है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बेहट तहसील में मुस्लिम आबादी करीब 51.2 प्रतिशत, सहारनपुर तहसील में 46.8 प्रतिशत, नकुड़ में 38.5 प्रतिशत, देवबंद में 39.8 प्रतिशत और रामपुर मनिहारान में करीब 20.2 प्रतिशत है। इन सीटों पर अल्पसंख्यक वोटों की भूमिका अहम रहती है।
इमरान की बयानबाजी भी चर्चा में रहती है। इकरा हसन से लेकर आशु मलिक पर उनकी तीखी टिप्पणियाँ सामने आ चुकी हैं। कार्यकारी अध्यक्ष बनते ही उन्हें पार्टी के भीतर और गठबंधन की राजनीति में संतुलन बैठाना होगा ताकि संघर्ष न बढ़े और बातचीत में कांग्रेस की हिस्सेदारी सुरक्षित रहे।
आगे क्या होगा
अब यह देखना होगा कि सहारनपुर के सांसद से प्रदेश के रणनीतिक चेहरे बने इमरान अपनी छवि और प्रभाव को संगठन और चुनावी रणनीति में कितनी मजबूती से बदल पाते हैं। 2027 की तैयारियों में उनके कदम और गठबंधन की बातचीत की प्रक्रिया स्थानीय राजनीति पर असर डालेगी।
स्रोत: अमर उजाला

