सहारनपुर। दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्राओं द्वारा लगाए गए नारे ‘दो कचौड़ी, एक समोसा, मर्दों का क्या भरोसा’ पर मेरठ के मशहूर देवबंदी उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। यह नारा दक्षिण दिल्ली के कालकाजी इलाके में 17 साल की नाबालिग के साथ हुए रेप के खिलाफ दिया गया था और सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो गया है।
मौलाना ने कहा कि नारे की भाषा सुनकर उन्हें हैरत हुई, लेकिन उन्होंने साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि नारे के पीछे छिपी महिलाओं की सुरक्षा और चिंता को समझना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि नारे की भाषा और अंदाज़ पर अलग-अलग राय हो सकती है और इस पर बहस भी हो सकती है।
भाषा से परे मुद्दा
मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा, “भाषा से इतर सोचने की जरूरत”। उनके अनुसार इस नारे को केवल शब्दों के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके पीछे सुरक्षा और सम्मान से जुड़ी उन चिंताओं को समझना चाहिए जो छात्राएं व्यक्त कर रही हैं। उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ एक नारे का नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक तरबियत का भी है।
उलेमा ने घर की परवरिश और तालीम पर भी बात की। उन्होंने कहा कि समाज के लोग बड़ी‑बड़ी डिग्रियाँ दिला देते हैं, पर व्यवहार और जिम्मेदारी सिखाना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने बताया कि तालीम इंसान को काबिल बनाती है, लेकिन अच्छी परवरिश उसे अपने व्यवहार समझने वाला बनाती है।
मौलाना ने खास तौर पर बच्चों के पालन‑पोषण पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, “हमें अपने बच्चों, खास तौर पर बेटों को यह सिखाना चाहिए कि महिलाओं और लड़कियों के साथ सम्मान, शालीनता और ज़िम्मेदारी के साथ पेश आना कितना ज़रूरी है।” उनका तर्क रहा कि घर से मिलती सही तालीम ही समाज में बेहतर व्यवहार की शुरुआत है।
लोकल असर और आगे क्या होगा
इस बयान के बाद स्थानीय स्तर पर भी चर्चा शुरू हो गई है। कई लोग नारे की भाषा पर बहस कर रहे हैं, तो कुछ का ध्यान महिला सुरक्षा पर है। पढ़ाई‑लिखाई के साथ परवरिश पर भी नया जोर दिया जा रहा है। आगे किसी फोरम या बैठक में इस विषय पर चर्चा की उम्मीद जताई जा रही है।
स्रोत: News18

