बहराइच। कतर्नियाघाट के जंगल से सटे कई गांवों में शाम अब डर का समय बन गई है। हाल की दो घटनाओं के बाद लोग ढलते सूरज के साथ घरों में सिमट जाते हैं।
7 सितंबर की रात नौ साल के राजवीर को तेंदुए ने मार डाला और 18 सितंबर की रात सीतारामपुरवा में 86 साल की बुजुर्ग महिला को तेंदुए ने हमला कर मार दिया। इन दो हत्याओं के बाद ग्रामीणों में भय और बढ़ गया है। वन विभाग ने पिंजरा लगाया है और कुछ जगहों पर रात की लाइटें भी लगा दी गईं हैं, पर खौफ कम नहीं हुआ।
ग्रामीणों की बदलती दिनचर्या
किसान अब अकेले खेतों में नहीं जा रहे। बच्चे स्कूल जाने से डरते हैं और महिलाएं चारा लेने या जरूरी काम के लिए बाहर जाने से कन्नी काट रही हैं। कई लोग सुबह होने तक शौचालय और अन्य काम घर के अंदर ही निपटाते हैं।
मुरली और सुदामा देवी ने कहा, “नहर किनारे रहना अब जान जोखिम में डालना है। कहीं और घर बसाएंगे, जहां हमले का डर न हो।” मालती कहती हैं, “सूरज ढलते ही बच्चों को लेकर घर में बंद हो जाते हैं। अब सुबह होने का इंतजार ही जिंदगी का हिस्सा है।”
राजवीर की बुआ संजू ने बताया, “पहले शाम क्या रात में भी कहीं आते जाते थे, बाहर भी सो जाते थे, लेकिन अब तो शाम ढलते ही बच्चों को लेकर घर के अंदर बंद हो जाते हैं।” मां कंसीला अभी भी गमगीन बैठी हैं और कहानियों में बेटे की कमी का दर्द साफ दिखाई देता है।
बाजारों में भी डर दिखता है। चफरिया बाजार के रवींद्र बताते हैं कि पहले तेंदुए गांवों तक नहीं आते थे, अब वे घरों तक पहुंच रहे हैं और लोग शाम में बाजार से लौटते हुए भय के साथ चलते हैं। जमुनहा मोड़ के बाघ मित्र संदीप सिंह कहते हैं, “तेंदुओं के बढ़ते हमलों ने ग्रामीणों की जिंदगी मुश्किल कर दी है।”
आगे क्या होगा, यह ग्रामीण और वन विभाग दोनों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। कई परिवार घर छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। वन विभाग से अपेक्षा है कि पिंजरों व पैदल गश्त से स्थिति पर काबू पाएंगे और लोगों को सुरक्षित वापस खेतों व बाजारों में आने- जाने का भरोसा मिलेगा।
स्रोत: अमर उजाला

