एटा। पितृपक्ष आज से शुरू हो गया है और यह 26 सितंबर से 10 अक्तूबर तक चलेगा। इस बार कुल 15 दिनों में 16 श्राद्ध पड़ रहे हैं।
श्राद्ध की तिथियां इस प्रकार हैं: 26 सितंबर : पूर्णिमा, 27 सितंबर : प्रतिपदा, 28 सितंबर : द्वितीया, 29 सितंबर : तृतीया श्राद्ध, महाभरणी, 30 सितंबर : चतुर्थी-पंचमी, 1 अक्तूबर : षष्ठी, 2 अक्तूबर : सप्तमी, 3 अक्तूबर : अष्टमी, 4 अक्तूबर : नवमी, मातृ नवमी, 5 अक्तूबर : दशमी, 6 अक्तूबर : एकादशी, 7 अक्तूबर : द्वादशी, मघा श्राद्ध, 8 अक्तूबर : त्रयोदशी, 9 अक्तूबर: चतुर्दशी, 10 अक्तूबर : सर्व पितृ अमावस्या।
तर्पण व पिंडदान की परंपरा
ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि तर्पण के लिए स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल, जौ, कुश और गंगाजल का इस्तेमाल किया जाता है। उसके बाद पके चावल, काले तिल और शहद से पिंड बनाकर पिंडदान किया जाता है।
भोजन बनने पर पंचबलि के तहत गाय, कुत्ते, कौवा, देवता और चींटी के लिए अंश निकाला जाता है। इसके बाद ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा देने की रिवाज़ निभाई जाती है।
इन कामों से बचें
पितृपक्ष के दौरान कुछ नियम बताए गए हैं जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए। सूची में प्रमुख सावधानियां हैं: कोई पान न खाएं और शरीर पर तेल न लगाएं; खासतौर पर अंतिम दिन दूसरे शहर की यात्रा न करें; गुस्सा न करें; तामसिक या नशीले पदार्थों का सेवन न करें; चना, मसूर, उड़द, सत्तू, मूली, काला जीरा, खीरा, काला नमक, काला उड़द, बासी या अपवित्र फल/अन्न न लें; बिना संकल्प के श्राद्ध पूरा नहीं माना जाएगा—अंतिम दिन अक्षत, चंदन, फूल और तिल लेकर तर्पण करें; ब्राह्मणों व गरीबों को भोजन कराना और दान करना पितृदोष से छुटकारे के लिए जरूरी बताया गया है; तिल और कुशा का होना आवश्यक है और भोजन बनाने में लोहे के बर्तनों का प्रयोग न करें।
स्थानीय परिवारों पर इन परम्पराओं का गहरा असर रहता है। कई घर आज से तैयारी में लग गए हैं और ब्राह्मण निमंत्रण व सामग्री की सूची बना रहे हैं। कुछ लोग बताते हैं कि अंतिम दिन यानी 10 अक्तूबर की तैयारी विशेष रूप से जोरों पर है क्योंकि वह सर्व पितृ अमावस्या है।
पाठक अपना तिथियों का नोट बनाकर तर्पण व पिंडदान की व्यवस्था कर लें और अंतिम दिन के नियमों का विशेष ध्यान रखें।
स्रोत: अमर उजाला
