कानपुर। इअरबड्स आजकल लोगों की रोजमर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। कई लोग सफर, ऑफिस, जिम या आराम के समय घंटों इअरबड्स लगाकर गाने सुनते या कॉल पर बात करते हैं।
ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. ओमवीर सिंह ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक और तेज वॉल्यूम पर इअरबड्स का इस्तेमाल कानों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। लगातार तेज आवाज कान के अंदर मौजूद सुनने से जुड़ी नाजुक कोशिकाओं को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकती है।
कौन से लक्षण दिखें तो सावधान हों
कान खराब होने पर हमेशा आवाज पूरी तरह बंद नहीं होती, बल्कि आवाज समझने में दिक्कत होती है। भीड़ या शोर वाली जगह पर सामने वाले की आवाज सुनाई दे सकती है, लेकिन शब्द साफ़ नहीं समझ आते।
- कान में घंटी या सीटी जैसी आवाज आना
- कुछ समय के लिए आवाज दबी हुई महसूस होना
- टीवी या मोबाइल का वॉल्यूम पहले से अधिक रखना पड़ना
- भीड़ में लोगों की बातें समझने में समस्या
डॉ. ओमवीर सिंह बताते हैं कि कान के अंदर कोक्लीया नाम का हिस्सा होता है, जिसकी हेयर सेल्स आवाज को समझने में मदद करती हैं। तेज आवाज और लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने से ये सेल्स क्षतिग्रस्त हो सकती हैं और एक बार नुकसान स्थायी हो जाए तो इन्हें दोबारा ठीक करना संभव नहीं रहता।
इसके बाद मरीजों को आवाज सुनने और बातचीत समझने में मदद के लिए अक्सर हियरिंग एड का सहारा लेना पड़ता है। इसलिए इलाज खोजने की बजाय बचाव पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए।
कैंसे रखें ध्यान
विशेषज्ञों की सलाह है कि इअरबड्स या हेडफोन का वॉल्यूम सामान्यत: 60 प्रतिशत से नीचे रखें। लगातार कई घंटे सुनने के बजाय बीच-बीच में कानों को आराम दें। शोर वाली जगह पर वॉल्यूम बढ़ाने की बजाय अच्छी क्वालिटी वाले नॉइज़ कैंसलिंग हेडफोन का प्रयोग करें और सोते समय इअरबड्स का इस्तेमाल न करें।
कान में समस्या के शुरुआती संकेत दिखें तो तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ की जांच कराएँ। सुनने की क्षमता धीरे-धीरे घटने पर इसे उम्र या थकान समझकर न छोड़ें, समय पर सावधानी और जांच से आगे के नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।
स्रोत: News18
