महोबा। मूकबधिर शिल्पकार ओमप्रकाश के होंठ खामोश हैं, लेकिन उनके हाथ जादुई हैं। पिछले एक दशक से वह देवी‑प्रतिमाओं को आकार देकर उन्हें जीवंत बनाते हैं और उनकी कलाकारी की मांग महोबा से लेकर मध्यप्रदेश तक रहती है।
ओमप्रकाश मूलरूप से कबरई कस्बे के रहने वाले हैं और पिछले 10 साल से अधिक समय से महोबा में रहकर काम कर रहे हैं। वे हमीरपुर चुंगी के पास प्रतिमाएं तैयार करते हैं। करीब एक दशक पहले उन्होंने चित्रकूट में प्रतिमा निर्माण का हुनर सीखा था और फिर यही हुनर उनकी रोजी‑रोटी बन गया।
कला और मेहनत
प्रतिमा का ढांचा से लेकर चेहरे के भाव, आंखों की चमक और आभूषणों की नोक‑झोंक का सारा काम वे खुद करते हैं। उनकी अंगुलियों की मेहनत से मिट्टी धीरे‑धीरे देवी के स्वरूप में बदलती है। कई बार आंखों और चेहरे की भाव‑भंगिमा को अंतिम रूप देने में घंटों लग जाते हैं।
ओमप्रकाश ने अपनी शारीरिक अक्षमता को कभी बाधा नहीं बनने दिया। संवाद की समस्या के बावजूद उन्होंने ग्राहकों का भरोसा जीत लिया है। ग्राहक अपनी पसंद, आकार और डिजाइन लिखकर बताते हैं और ओमप्रकाश भी कागज पर लिखकर जवाब देते हैं। जरूरत पड़ने पर वे इशारों से अपनी बात समझाते हैं।
उनके यहाँ बनाए प्रतिमाओं की मांग नवरात्र से पहले खासतौर पर बढ़ जाती है और काम की रफ्तार भी तेज हो जाती है। महोबा में तैयार की गई कुछ प्रतिमाएं मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानों तक भेजी जाती हैं। ग्राहकों की पसंद से कई लोग दुबारा भी उनसे जुड़ जाते हैं।
प्रतिमा बनाना ओमप्रकाश के लिए रोजगार के साथ‑साथ आत्मप्रतिष्ठा का जरिया भी है। वह अपनी कला और मेहनत से परिवार का सहारा बन रहे हैं और आगे भी कला को बढ़ाने की कोशिश में जुटे हैं।
स्रोत: अमर उजाला

