लखनऊ। राष्ट्रीय बधिरता निवारण एवं नियंत्रण कार्यक्रम के हालिया सर्वे ने चेतावनी दी है कि बच्चों में सुनने और बोलने की समस्या शुरुआती लक्षणों पर ध्यान न दिए जाने से बढ़ सकती है। अस्पतालों में कई बच्चे गूंगे-बहरेपन के साथ आते हैं जिन्हें समय रहते पहचान कर रोका जा सकता है।
जिला अस्पताल के वरिष्ठ नाक-कान-गला (ईएनटी) विशेषज्ञ डॉ. अरुण जैन ने बताया कि परिजन यदि तीन चरणों में बच्चे के व्यवहार पर नजर रखें तो यह गंभीर स्थिति टाली जा सकती है। इन चरणों में अलग-अलग संकेत आते हैं जिन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए।
तीन आयु चरण और संकेत
पहला चरण: शून्य से 3 महीने, यदि तेज आवाज पर बच्चा अचानक न चौंके, परिजन की आवाज पर आंखें न घुमाए या आवाज सुनकर शांत न हो तो यह संकेत है।
दूसरा चरण: 4 से 6 महीने, नई आवाज पर बच्चा उस दिशा में न देखे, आवाज की सुर या अभिव्यक्ति समझकर न रोए, हंसे और तेज आवाज से न डरे तो सुनने में परेशानी हो सकती है।
तीसरा चरण: 7 से 12 महीने, नाम लेकर बुलाने या फोन की घंटी पर प्रतिक्रिया न देना, अकेले में न बड़बड़ाना और अपनों की आवाज पर प्रतिक्रिया न देना घबराहट की बात है। डॉ. जनार्दन बाबू ने बताया कि सर्वे में जातीय रूप से निकट विवाहों (सजातीय विवाह) वाले परिवारों में सुनने-बोलने की समस्याएँ अधिक देखी गईं।
क्या करें और किन बातों पर ध्यान दें
विशेषज्ञ बताते हैं कि 15 महीने की उम्र में बच्चा खिलौना पकड़ना शुरू कर देता है और 18 महीने तक दादी, बाबा, मामा जैसे शब्द बोलने लगना चाहिए। अगर ये संकेत न दिखें तो तुरंत डॉक्टर से दिखाएँ।
सरकार 18 महीने की उम्र के बच्चों के लिए निशुल्क कॉक्लियर इम्प्लांट कराने का विकल्प उपलब्ध कराती है, जिससे सुनने और बोलने की क्षमता सामान्य होने की आशा रहती है। शुरुआती पहचान और समय पर इलाज से बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर रहता है।
स्रोत: अमर उजाला

