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वाराणसी: 350 साल पहले धर्म बदला, उसिया के कमसार परिवार अब भी हिंदू रीति निभाते

ग्राम पंचायत उसिया में करीब 40 हजार लोग रहते हैं; यहां से जुड़े धर्मांतरित परिवार हर साल यूपी-बिहार से करीब 700 लोग एक भोज में मिलते हैं।

वाराणसी: 350 साल पहले धर्म बदला, उसिया के कमसार परिवार अब भी हिंदू रीति निभाते
फोटो: अमर उजाला

वाराणसी। गाजीपुर के दिलदारनगर इलाके की ग्राम पंचायत उसिया में रहने वाले कई परिवारों के पूर्वज करीब 350 साल पहले इस्लाम धर्म अपना गए थे, लेकिन उनकी सामाजिक परंपराएं आज भी हिंदू रीति-रिवाज से जुड़ी हैं। इस गांव की कुल आबादी करीब 40 हजार है और यहां की मुस्लिम आबादी लगभग 24 हजार बताई जाती है।

गांव के निवासी बताते हैं कि पहले के वंशज फतेहपुर सीकरी से आए थे और कुछ ने समय के साथ इस्लाम अपनाया। रेलवे से सेवानिवृत्त ट्रांसपोर्ट निरीक्षक औरंगजेब खान का कहना है कि सैनूमल, पूरनमल और नरहरदेव नाम के लोग वहीं से आए थे और बाद में नरहरदेव ने इस्लाम कबूल किया। कमिसरा डीह बाद में कमसार बना, जिसमें करीब 12 गांव आते हैं।

रिवाज और पहचान

सरकारी रिकॉर्ड और गांव वालों की बातचीत में दिखता है कि कई परिवार अपनी पुरानी जड़ों से जुड़े हैं। गांव के अलाउद्दीन खान कहते हैं कि हमारे हिंदू वंशजों से आज भी मेल-मिलाप है और समारोहों में ढोलक-नाच चलता है। व्यापारी रियाज खान अपने गोत्र सिकरवार होने का दावा करते हैं और बताते हैं कि उनके पूर्वज ठाकुर थे।

निवर्तमान प्रधान शम्स तबरेज खां ने कहा, “हम लोग भूमिहार बिरादरी से धर्मांतरित हैं। साल-दो साल में सालाना भोज होता है। इसमें यूपी और बिहार के धर्मांतरित मुस्लिम जुटते हैं।” वे बताते हैं कि कमसार से कुल मिलाकर करीब 700 हिंदू और मुस्लिम इस आयोजन में आते हैं। पिछली बार भोज शेरपुर और रेवतीपुर में रखा गया था।

डॉ. कुंअर मुहम्मद नसीम रजा सिकरवार, जो इस क्षेत्र पर दो दशकों से शोध कर रहे हैं, ने कहा, “हम अपने पूर्वजों को नहीं बदल सकते:” उन्होंने बताया कि कुंअर नवल सिंह ने 1678 में इस्लाम धर्म अपनाया था और आज भी कई परिवार अपने वंश का नाम सिकरवार लिखते हैं।

गांव में महिलाएं साड़ियां पहनती हैं और पुरुष कुर्ता-धोती पहनते हैं। गृह प्रवेश पर दउरी में पांव रखने की रिति, माथे पर चंदन लगाने और ढोलक की थाप पर गीत गाने जैसी परंपराएं आज भी कायम हैं। कुछ परिवारों में शादी-ब्याह और भोज जैसी रस्में आज भी पुरानी परंपराओं के अनुरूप होती हैं।

ग्राम के बुज़ुर्ग और शोधकर्ता दोनों इस बात पर ज़ोर देते हैं कि नई पीढ़ी को इन रिश्तों और जड़ों से जोड़ा जाए। अगले चरण में स्थानीय सामाजिक समूह और परिवार मिलकर आने वाले वर्षों में इन मेलजोल के आयोजनों को नियमित रखने की बात कर रहे हैं ताकि परंपरा और पहचान दोनों जिन्दा रहें।

स्रोत: अमर उजाला

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Vikas Kumar

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कई वर्षों से समाचार, योजना, रोजगार इत्यादि मामलों से जुड़े कार्यों में संलग्न।