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वाराणसी: बीएचयू समेत पांच संस्थानों के शोध में पता चला, हिमालयी वादियों में मेंढक घटे, जेनेटिक विविधता कम

दार्जिलिंग के 57 स्थानों पर 200 से 2400 मीटर की ऊँचाई पर नमूने लेकर शोध में पाया गया कि स्थानीय मेंढकों की आनुवंशिक विविधता एशिया के अन्य हिस्सों से सबसे कम है।

वाराणसी: बीएचयू समेत पांच संस्थानों के शोध में पता चला, हिमालयी वादियों में मेंढक घटे, जेनेटिक विविधता कम
फोटो: अमर उजाला

वाराणसी। बीएचयू समेत पांच संस्थानों के शोध में खुलासा हुआ है कि पूर्वी हिमालय, खासकर दार्जिलिंग की वादियों में पाए जाने वाले एक मेंढक समूह की आबादी घट रही है और उनकी आनुवंशिक विविधता भी कम हो गई है। शोध दल ने दार्जिलिंग के पहाड़ी क्षेत्र के 57 स्थानों से नमूने लेकर अध्ययन किया।

टीम ने 200 मीटर से 2400 मीटर तक की ऊँचाई पर स्थित झरनों और तेज धाराओं में रहने वाले मेंढकों के नमूने संग्रहित किए। शोध में 16S rRNA और COI नामक दो मानक जीनों की जीनानुक्रमणीय जांच की गई और दुनिया भर के डीएनए अनुक्रमों से तुलना की गई। दार्जिलिंग की आबादी में डीएनए विविधता सबसे कम पाई गई।

आनुवंशिक निष्कर्ष और समयरेखा

शोध में संकेत मिला कि दार्जिलिंग की मेंढक आबादी लंबे समय से अन्य क्षेत्रों से अलग-थलग रही है और जीन प्रवाह सीमित है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस प्रजाति का साझा पूर्वज लगभग 1.74 करोड़ वर्ष पहले मौजूद था। दक्षिण एशियाई शृंखला करीब 1.12 करोड़ वर्ष पहले अलग हुई और वर्तमान दार्जिलिंग वंश लगभग 9.4 लाख वर्ष पहले विकसित हुआ।

शोध के प्रथम लेखक कुमरेश मंडल का मानना है कि दार्जिलिंग की वर्तमान आबादी की शुरुआत इतिहास में एक छोटे समूह से हुई होगी, जिसे वैज्ञानिक भाषा में फाउंडर इफेक्ट कहा जाता है। इससे समय के साथ आनुवंशिक विविधता कम रह गई और आबादी अलग-थलग हो गई।

स्थानीय शिकार और उपयोग को भी आबादी घटने का कारण बताया गया है। शोध में कहा गया है कि बरसात के समय रात में चट्टानों और झाड़ियों पर बैठे मेंढकों को पकड़ना आम बात है। दार्जिलिंग के स्थानीय लोग इन मेंढकों को ‘सिसने पाहा’ या ‘सिसने पा’ कहते हैं और इन्हें भोजन व पारंपरिक उपचार के लिए पकड़ा जाता रहा है।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के डॉ. राकेश तामांग ने कहा कि दार्जिलिंग के मेंढकों की आबादी आनुवंशिक रूप से अलग और कम विविधता वाली है। बीएचयू के जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि पूर्वी हिमालय के मेंढकों में आनुवंशिक विविधता पश्चिमी घाट की तुलना में कम है और ऐसी आबादी जलवायु परिवर्तन व बीमारियों के लिए अधिक संवेदनशील हो सकती है।

शोधकर्ता स्थानीय लोगों में जागरूकता बढ़ाने पर ज़ोर दे रहे हैं ताकि पारंपरिक शिकार और उपयोग से रोककर संरक्षण में मदद मिल सके। आगे के संरक्षण कार्यक्रम तथा नीति निर्माण के समय इन आनुवंशिक निष्कर्षों को ध्यान में रखने की सलाह दी गई है।

स्रोत: अमर उजाला

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Vikas Kumar

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कई वर्षों से समाचार, योजना, रोजगार इत्यादि मामलों से जुड़े कार्यों में संलग्न।