ज्ञानपुर। जनपद में ऑटिज्म से पीड़ित किशोर और किशोरियों के लिए काउंसिलिंग तथा विशेष थेरेपी की कोई समर्पित सुविधा मौजूद नहीं है। जिला अस्पताल और सीएचसी में काउंसिलर तैनात जरूर हैं, पर थेरेपी सेंटर नहीं है और डीईआईसी की सुविधा भी अनुपस्थित है।
जिला मानसिक विभाग की ओपीडी में किशोरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हर महीने करीब 50 ओपीडी हो रही है, जिनमें ज्यादातर मानसिक विकृति से पीड़ित मरीज हैं और इनमें ऑटिज्म के मरीज भी शामिल हैं। स्पीच थेरेपी, बिहेवियर थेरेपी और विशेष काउंसलिंग के लिए मरीजों को वाराणसी व प्रयागराज सहित अन्य जिलों में रेफर करना पड़ता है।
सुविधाओं की कमी और खर्च
डीईआईसी जैसे विकास और इंटरवेंशन केंद्र न होने के कारण अभिभावकों को बच्चों का इलाज कराने दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। दूसरे जिलों में जाने से दवा के साथ-साथ इलाज के कारण किराये और अन्य खर्च भी बढ़ जाते हैं। अगर रिजर्व वाहन से जाना पड़ता है तो करीब 2000 रुपये के आसपास खर्च आता है।
मनोचिकित्सक डॉ. अभिनव पांडेय ने कहा, “ऑटिज्म बीमारी से पीड़ित किशोर व किशोरियों की दिमागी क्षमता शून्य हो जाती हैं। जो आगे चलकर गंभीर बीमारी का रूप ले लेती है। बीमारी के प्रमुख लक्षण हाथ, पैर बार-बार पटकना है।” उन्होंने बताया कि स्पेशल एजुकेटर इन बच्चों का उपचार करते हैं और शुरुआती पहचान व हस्तक्षेप जरूरी है।
डॉ. पांडेय ने यह भी बताया कि पढ़ाई का दबाव, परीक्षा, पारिवारिक परिस्थितियां और व्यवहार में बदलाव के कारण किशोर मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य विभाग में आने वाले मरीजों में किशोरों की बढ़ती संख्या चिंता का कारण बनी हुई है।
आगे क्या होगा
जिला अस्पताल के सीएमओ डॉ. एसके चक का कहना है, “जिले में आठ काउंसिलर और दो मनोचिकित्सक डॉक्टर की तैनाती है। जहां काउंसिलिंग करके बेहतर उपचार किए जाते हैं।” उन्होंने कहा कि डीईआईसी की विशेष सुविधा नहीं है और इसके लिए उच्चाधिकारी से बातचीत की जाएगी।
अभिभावकों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर स्पीच व बिहेवियर थेरेपी मिल जाए तो खर्च और दूरी दोनों कम हो जाएंगे। अब अगले कदम में प्रशासन से डीईआईसी या थेरेपी सेंटर खोलने की पहल की उम्मीद है ताकि मरीजों को दूर-दराज के शहरों का सहारा न लेना पड़े।
स्रोत: अमर उजाला

