भदोही। कालीन बुनाई से लेकर एक्सपोर्ट तक के सफर में 2017 के बाद पूर्वांचल का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है, कहते हैं कालीन निर्यात संवर्धन परिषद के सदस्य पीयूष कुमार बरनवाल। उन्होंने कहा कि 2017 से पहले यह इलाका उपेक्षित और पिछड़ा माना जाता था, लेकिन उसके बाद सरकार की नीतियों ने ठहराए व्यवसायों को रफ्तार दी।
पीयूष ने बताया, “उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक इतिहास में साल 2017 एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है।” उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2016-17 में उत्तर प्रदेश का कुल मर्चेंडाइज निर्यात मात्र 84,076 करोड़ रुपया था।
पूर्व की चुनौतियां
बरनवाल ने बताया कि 2017 से पहले पूर्वांचल तंगहाली, माफियाओं और संगठित अपराध की छाया में था। वहाँ सड़कें, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे की कमी थी। इसका असर कालीन उद्योग पर पड़ा क्योंकि समय पर माल नहीं पहुंचने से विदेशी खरीदार कटने लगे थे और बिजली संकट ने उत्पादन लागत बढ़ा दी थी।
उन्होंने कहा, “जो भदोही कभी अपनी बुनाई कला और रेशमी-ऊनी कालीनों के लिए वैश्विक पटल पर भारत की धाक जमाता था, वह 2017 से पहले दम तोड़ने की कगार पर पहुंच चुका था।” बुनकरों का पलायन और बाजारों तक पहुंच का अभाव उस समय की प्रमुख समस्याएं थीं।
सरकारी कदम और असर
पीयूष के मुताबिक योगी सरकार ने ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनाकर माफियागिरी पर अंकुश लगाया और निवेश का वातावरण सुधारा। साथ ही पूर्वांचल एक्सप्रेसवे जैसे बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट, वाराणसी हवाईअड्डे का विस्तार और बिजली आपूर्ति में सुधार ने निर्यातकों को सीधे बंदरगाहों तक पहुंच दी।
ओडीओपी यानी ‘एक जिला, एक उत्पाद’ योजना ने भदोही के कालीन को ब्रांड करने, वित्तीय मदद और आधुनिक उपकरण तथा वैश्विक मार्केटिंग प्लेटफॉर्म देने में मदद की। बरनवाल कहते हैं कि इन बदलावों के परिणाम आधिकारिक आंकड़ों में भी दिखते हैं और अब भदोही फिर से वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ बना रहा है।
स्थानीय बुनकरों और व्यापारी वर्ग के लिए अगले कदम उद्योगों की निरंतर तकनीकी मदद, मार्केट लिंकिंग और टिकाऊ बिजली व्यवस्था बनाए रखना होगा। जो लोग भदोही के कालीन या निर्यात से जुड़ना चाहते हैं, उन्हें संबंधित सरकारी योजनाओं और व्यापारिक मंचों से जुड़ने की सलाह दी जा रही है।
स्रोत: TV9 भारतवर्ष

