प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि माता‑पिता बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए बालिग बेटी को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने मऊ की रहने वाली महिला से जुड़े मामले में दिया।
कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि जब कोई बालिग व्यक्ति अपने निवास के बारे में स्पष्ट, स्वैच्छिक और स्वतंत्र निर्णय लेता है तो उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिए। मामले की बात करें तो याची माँ ने अदालत से बेटी को पेश कराने और उसके साथ रहने की अनुमति देने की मांग की थी।
अदालत की जांच और प्रस्तुति
आदेश के अनुपालन में घोसी थाने की पुलिस ने बेटी को अदालत में पेश किया। अदालत में मौजूद 25 वर्षीय महिला ने साफ कहा कि वह दिल्ली में स्वतंत्र रूप से रह रही है और अपनी मां के साथ रहने से इनकार करती है। अदालत ने यह भी देखा कि मामले में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला जिससे साबित हो कि महिला किसी अवैध या गैरकानूनी हिरासत में है।
हाईकॉर्ट ने स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत से मुक्त कराना है। इसे यह कह कर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि किसी बालिग को विशेष व्यक्ति के साथ रहने के लिए बाध्य किया जाए, केवल इसलिए कि वह उसके माता‑पिता हैं।
अदालत ने यह संकेत दिया कि कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और व्यक्तिगत आज़ादी का सम्मान न्यायिक प्रणाली का आधार है। पीठ ने याची की याचिका खारिज कर दी और मामला यहीं समाप्त कर दिया गया।
स्थानीय लोगों के लिए यह फैसला परिवारिक विवादों में बालिग सदस्य की स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। अब इसी तरह के मामलों में उच्च न्यायालय के इस निर्णय का हवाला दिया जा सकता है।
आगे क्या होगा, इस पर अदालत ने विशेष रूप से कोई अगला निर्देश नहीं दिया है। प्रभावित पक्षों को कानूनी विकल्पों और अपने अधिकारों के बारे में संज्ञान लेते हुए आगे की कार्रवाई करनी चाहिए।
स्रोत: अमर उजाला

