प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि बच्चों के यौन शोषण के साथ जुड़ी सामग्री को केवल बनाना ही अपराध नहीं है, उसे डाउनलोड करना, देखना या अपने पास रखना भी कानून के तहत अपराध माना जा सकता है। यह बात अदालत ने अपनी ई‑पुस्तिका के छठे संस्करण में रखी है।
पुस्तिका में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस बनाम हरीश जैसे चर्चित मामलों के फैसलों का हिंदी अनुवाद शामिल है। इसे न्यायमूर्ति अजित कुमार, न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह, न्यायमूर्ति समीर जैन और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी ने प्रकाशित किया है।
फैसलों का अनुवाद और जरूरी निर्देश
पुस्तिका में सुप्रीम कोर्ट के उन अहम बिंदुओं को भी स्थान दिया गया है जिसमें कहा गया था कि बच्चों से जुड़ी यौन शोषण सामग्री के बारे में ‘चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन एंड एब्यूज मैटेरियल’ शब्द का उपयोग किया जाना चाहिए। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ऐसी सामग्री को डाउनलोड करना, देखना या अपने पास रखना भी अपराध हो सकता है।
इसके अलावा पुस्तिका में स्कूलों में जागरूकता और यौन शिक्षा, पीड़ितों को सहायता, जागरूकता अभियान तथा जोखिम वाले लोगों की समय रहते पहचान करने जैसे उपायों पर भी जोर दिया गया है।
यह ई‑पुस्तिका अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों, विधि छात्रों, शोधकर्ताओं और आम लोगों के लिए उपयोगी रहने की उम्मीद की जा रही है। पाठक इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट की वेबसाइट के ई‑इलाहाबाद उच्च न्यायालय निर्णय पत्रिका टैब पर निशुल्क पढ़ सकते हैं।
अदालत ने इस तरह के फैसलों को व्यापक रूप से समझने और लागू करने की आवश्यकता के संकेत दिए हैं ताकि बच्चों की सुरक्षा मजबूत हो सके। जो लोग कानूनी और शैक्षिक क्षेत्र से जुड़े हैं, वे इस संसाधन से मार्गदर्शन ले सकते हैं।
आगे की कार्रवाई के तौर पर पब्लिक और पेशेवर दोनों ही इस ई‑पुस्तिका को देखकर स्थानीय स्तर पर जागरूकता और नीतिगत कदमों पर काम कर सकते हैं।
स्रोत: अमर उजाला

