वाराणसी। शहर के एक आश्रम में पिछले एक साल में 55 बुजुर्ग निवासियों की मौत दर्ज की गई है, जबकि कई परिजन इनका अंतिम संस्कार कर लेने के लिए केवल बीमा क्लेम और संपत्ति के कागजात लेकर ही आते हैं। आश्रम में रहने वालों का सामान पहले दिन से टैग कर फोटो के साथ रखा जाता है।
आश्रम के कर्मचारी बताते हैं कि जब परिजन शव या मृत्यु प्रमाण पत्र लेने आते हैं तो दाह-संस्कार करवा लेते हैं और फिर कागजात में गवाह बनकर यह साबित कर देते हैं कि वे रिश्तेदार हैं। शव लेते समय वे बुजुर्जों की गठरी, सामान, पैसा, गहने और कपड़े भी साथ ले जाते हैं, जबकि आश्रम पहले से ही हर वस्तु का रिकॉर्ड रखता है।
परिवारों का रवैया और बहाने
कई मामलों में आश्रम से फोन करने पर रिश्तेदार मिलने आने से इंकार कर देते हैं। यह मौक़ा महिलाओं के साथ अधिक देखने को मिला है। डॉ निरंजन ने बताया कि उनके यहाँ एक 105 साल की महिला रह रही हैं। उन्होंने गोद लेकर सौतेले बेटे को पाला था। जब बेटे से कहा मां से मिलने आ जाओ तो बेटा मुकर गया, बोला – “हम चौरसिया हैं, वो ब्राह्मण तो मैं कैसे उनका बेटा हो गया”।
कुछ मामले ऐसे भी हैं जहां परिजन दूर रहते हैं या विदेश में हैं। उदाहरण के लिए बेनियाबाग के 65 वर्ष के बुजुर्ग को सड़क पर लावारिस हालत में आश्रम में जगह दी गई थी। उनका बेटा दुबई में नौकरी करता था और दो दिन बाद शव लेने आया। दरभंगा के 70 वर्षीय सराफा कारोबारी ने जीवन के अंतिम समय में काशी में आश्रम में गुज़ारे और बाद में परिजन आए; उनकी तीन सराफा दुकानें और गांव में पांच बीघा जमीन बताई गई।
एक 60 वर्षीय जमींदार परिवार के बुजुर्ग ने अपने नाम से 50 लाख रुपये का बीमा कर रखा था और तीन साल से आश्रम में रह रहे थे। अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी बेटा नहीं आया, लेकिन मौत के अगले दिन ही परिजन शव लेने पहुंचे।
अगला कदम
आश्रम प्रशासन अब इन मामलों का रिकॉर्ड और कागजात और ज्यादा व्यवस्थित करने की बात कह रहा है ताकि अंतिम संस्कार और संपत्ति के हस्तांतरण में पारदर्शिता बनी रहे। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों से भी ऐसे बुजुर्गों के प्रति सतर्कता और देखरेख की अपील जारी है।
स्रोत: अमर उजाला

