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मिर्ज़ापुर: पितृपक्ष में गया श्राद्ध के लिए तीन पीढ़ियों ने इकठ्ठा किए अक्षत-चावल

गया में पिंडदान के दिन परंपरा के अनुसार रिश्तेदार घर-घर जाकर एक मुट्ठी अक्षत चावल दान में मांग रहे हैं ताकि पिंडदान निभाया जा सके।

मिर्ज़ापुर: पितृपक्ष में गया श्राद्ध के लिए तीन पीढ़ियों ने इकठ्ठा किए अक्षत-चावल
फोटो: अमर उजाला

मिर्ज़ापुर। पितृपक्ष चल रहा है और जिले के लोगों ने गया श्राद्ध के लिये अक्षत-चावल इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है। लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी की परंपरा निभाते हुए रिश्तेदारों के घर जाकर एक मुट्ठी अक्षत चावल दान में मांग रहे हैं।

स्थानीय परंपरा के मुताबिक गया में पिंडदान के दिन यही अक्षत इस्तेमाल होता है। वर्षों से संपर्क न होने पर भी तीन पीढ़ियों के रिश्तेदारों के यहां से चावल लेने की रीत कायम है। कई परिवारों ने बताया कि इसी चावल से पिंड-दान और तर्पण की रस्में पूरी की जाती हैं।

परंपरा और रीति-रिवाज

कर्मकांड के विद्वान पंडित गोपाल पांडेय ने कहा, “पितृपक्ष में पूर्वजों के तर्पण के लिए पूजा-अनुष्ठान किए जाते हैं। लोग गंगा घाट, नदी और तालाबों पर तर्पण व पिंडदान करते हैं। गया में पिंडदान का विशेष महत्व है। गया श्राद्ध के दिन रिश्तेदारों, नातेदारों और पड़ोसियों को भी आमंत्रित करने की परंपरा है।धार्मिक मान्यता है कि पितृपक्ष में कौआ, गाय, गरीब, असहाय, ब्राह्मण और अतिथि का सत्कार करना शुभ माना जाता है.”

गांवों व शहरों में श्रद्धालु गंगा घाटों और स्थानीय तालाबों पर तर्पण में जुटे दिख रहे हैं। कुछ परिवारों ने बताया कि पिंडदान के लिये जुटाई जाने वाली सामग्री में अक्षत सबसे अहम माना जाता है, इसलिए यह घर-घर जाकर मांगना जारी रहता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा रिश्तों को जोड़ने का भी जरिया बनती है। जिन परिवारों से अक्षत लिया जाता है, उन्हें भी पिंडदान के दिन आमंत्रित किया जाता है ताकि सभी मिलकर पूजा कर सकें।

आगे क्या होगा

पितृपक्ष की समाप्ति तक जिले के कई गांवों और मोहल्लों में यह क्रम चलता रहेगा। जिन लोगों को अक्षत देने या लेने में कोई समस्या हो, वे अपने नजदीकी मंदिर या स्थानीय पंडितों से मार्गदर्शन ले सकते हैं।

स्रोत: अमर उजाला

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Alok Kumar

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कई वर्षों से समाचार, योजना, रोजगार इत्यादि मामलों से जुड़े कार्यों में संलग्न।