वाराणसी। पितृपक्ष के दौरान पिशाच मोचन तीर्थ को लेकर श्रद्धालुओं में खास श्रद्धा दिखती है। यह तीर्थ बाबा विश्वनाथ के दरबार से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित है और इसे विमल तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस तीर्थ की स्थापना भगवान शिव के एक भक्त कपर्दी ने की थी। उनके कठोर तप से कपद्रीश्वर महादेव प्रकट हुए। तीर्थ के बारे में कहा जाता है कि यहीं महर्षि वाल्मीकि के कहने पर एक ब्राह्मण को प्रेत योनि से मुक्ति मिली थी।
इतिहास और धर्मिक महत्व
तीर्थ के पुरोहित मुन्ना महाराज बताते हैं कि इस कुंड का इतिहास गंगा के अवतरण से भी पहले का है। कुंड का उल्लेख काशी खंडोक्त में मिलता है और गरुण पुराण में भी इसका वर्णन है। कई पौराणिक कथाएँ इस स्थान से जुड़ी हुई हैं और इन्हीं कथाओं ने इसे विशेष धार्मिक महत्ता दी है।
पिशाच मोचन कुंड को उन स्थानों में गिना जाता है जहाँ न केवल पितरों के निमित्त श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किए जाते हैं, बल्कि कहा जाता है कि इससे भटकती आत्माओं को भी मुक्ति मिलती है। विशेषकर जहाँ किसी के घर में किसी की अकाल मृत्यु हुई हो, वहां त्रिपिंडी श्राद्ध और नारायण बलि कराई जाने से मुक्ति का मार्ग खुलता है।
गया के बाद पितृशांति के लिए यह स्थान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृपक्ष के पंद्रह दिनों में यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है। अलग-अलग राज्यों से प्रतिदिन करीब 25 से 30 हजार लोग श्राद्ध और तर्पण के लिए आते हैं।
स्थानीय मान्यताएँ और कर्मकाण्ड
कथाओं के अनुसार बैकुंड के स्वामी श्री हरी विष्णु से जुड़ी एक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस कुंड को पिशाच मोचन का वरदान दिया ताकि श्रद्धाभाव से स्नान करने वालों के पितृ संबंधित दोष दूर हो जाएं। श्रद्धालु यहां साधारण दिनों में भी तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं।
जो लोग इस तीर्थ पर आना चाहें उन्हें पितृपक्ष के दौरान भीड़ और अनुष्ठानों की व्यवस्था का ध्यान रखना चाहिए और स्थानीय पुरोहितों से मार्गदर्शन लेकर ही कर्मकाण्ड कराएं।
स्रोत: News18

