बलिया। पितृपक्ष के अवसर पर जब लोग अपने पूर्वजों को अंतिम श्रद्धांजलि दे रहे थे, मनियर थाना क्षेत्र के कोटवा के रहने वाले अखिलेश कुमार मिश्रा 12 साल के बेटे रजत मिश्रा के लिए तस्वीर को गले से लगाए खड़े थे। उन्होंने आरोप लगाया कि उसी समय उनके बेटे की ही देह पुलिस ने लावारिस बताकर संवर्धन कर दी थी।
अखिलेश के मुताबिक, उनका बेटा रजत 13 मई 2025 की शाम करीब 7:30 बजे अचानक गायब हो गया था। 15 मई 2025 को नदी किनारे एक शव मिलने की सूचना मिली तो उन्होंने पुलिस के सामने कहा, “साहब… मेरा बेटा है” और शव देने की मांग की।
परिवार का दावा है कि पुलिस ने शव की उम्र करीब 20 वर्ष बताई और पोस्टमार्टम में भी उम्र लगभग 20 वर्ष व वजन करीब 65 किलो लिखे गए। परिवार मानने पर मजबूर हो गया कि शायद रजत कहीं जीवित है। उन्होंने लगातार DNA जांच की मांग की।
पहचान और जांच
माता-पिता के नमूने लिए गए और लगभग छह महीने बाद DNA रिपोर्ट आई। रिपोर्ट में नदी किनारे मिले शव का मिलान रजत के माता-पिता से हो गया। अखिलेश ने बताया कि रिपोर्ट से पता चला कि वह शव वास्तव में उनका 12 वर्षीय बेटा ही था।
परिवार ने पुलिस अधिकारियों और अन्य स्तरों पर न्याय की गुहार लगाई है। उनका कहना है कि उन्हें और गवाहों को धमकियां मिलीं और उन्होंने कई बार शिकायतें दर्ज कराईं। पुलिस का इस बारे में कोई आधिकारिक बयान उपलब्ध नहीं है।
पिता ने कहा कि उन्हें अपने बेटे की देह के साथ अंतिम संस्कार का अधिकार ही नहीं मिला। पितृपक्ष पर उन्होंने रजत की तस्वीर छाती पर रखकर पुतला बनाकर झूठे अंतिम संस्कार की रस्म पूरी की। उनकी फाइल और तस्वीर ही अब उनके पास बची हैं।
अब सवाल
परिवार अब उन सवालों के जवाब चाहता है: रजत नदी तक कैसे पहुंचा, उसकी मृत्यु कैसे हुई और पहचान में इतनी बड़ी चूक क्यों हुई कि पिता की पहचान को स्वीकार न किया गया। जांच के निष्कर्ष और आगे की कार्रवाई का इंतजार है।
स्रोत: प्रभात खबर

