लखनऊ। आज 2 अक्टूबर, यानी महात्मा गांधी की जयंती के मौके पर देश उनके विचारों को याद कर रहा है और एक सप्ताह बाद 9 अक्टूबर को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि होगी। अगले साल 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए राजनीतिक पार्टियां कांशीराम को अपनी राजनीति से जोड़ने की कोशिश तेज कर रही हैं।
कांशीराम के विचारों के सहारे सबसे अधिक सक्रिय नजर आ रही पार्टियों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और कुछ वक्त के लिए कमजोर पड़ी बीएसपी शामिल हैं। कांग्रेस के बड़े नेता राहुल गांधी कांशीराम के नारे “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी” को बार-बार उठा रहे हैं और युवा वर्ग को जोड़ने के लिए कार्यक्रम चला रहे हैं। राहुल ने यूपी प्रभारी के रूप में राजेंद्र पाल गौतम को भी नियुक्त किया है।
राजनीतिक दांव-पेंच
कांग्रेस का मकसद वे दलित वोट लौटाना है जो 1990 के दशक में कांशीराम के उदय के बाद बीएसपी की ओर चले गए थे। उस समय बीएसपी ने 296 सीटों पर प्रभाव दिखाया जबकि कांग्रेस ने केवल 126 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। परिणामस्वरूप कांग्रेस यूपी में कमजोर पड़ गई और कई नेता अलग पार्टियों में चले गए।
समाजवादी पार्टी अब पहले से अलग रुख दिखा रही है। 1993 में सपा और बीएसपी का गठबंधन सफल रहा लेकिन 1995 में लखनऊ गेस्ट हाउस कांड के बाद दलित वोट सपा से दूर चले गए थे। आज अखिलेश यादव कांशीराम और अन्य दलित महापुरुषों को अपनी चुनावी छवि का हिस्सा बना रहे हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पीडीए फॉर्मूला अपनाया था।
बीएसपी की स्थिति भी बदल चुकी है। पार्टी का वोट शेयर 30 फीसदी से घटकर करीब 9 फीसदी रह गया है और 2012 के बाद से वह लगातार तीन विधानसभा चुनाव हार चुकी है। यही कमजोरी अन्य पार्टियों को कांशीराम के नाम का राजनीतिक लाभ उठाने का अवसर दे रही है।
स्थानीय प्रभाव के लिहाज से कांशीराम की पुण्यतिथि पर होने वाले कार्यक्रम और नेताओं की भागीदारी से चुनावी माहौल और तेज होगा। अब अगले कुछ हफ्तों में प्रदेश के विभिन्न कार्यक्रमों में किस नेता की मौजूदगी रहेगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
पाठक जिन्हें भी अपने क्षेत्र में कांशीराम के नाम पर होने वाले कार्यक्रमों की जानकारी चाहिए, वे स्थानीय पार्टी कार्यालय या आयोजकों से संपर्क कर सकते हैं।
स्रोत: News18

