वाराणसी। नगर निगम की कार्यकारिणी समिति 8 अक्तूबर को उस शिवलिंग के नामकरण पर निर्णय लेगी जिसे बंटवारे के समय पाकिस्तान से काशी लाया गया था। यह प्रस्ताव सिंधी समाज की ओर से नगर निगम में पेश किया गया है।
सिंधी समाज से जुड़े पूर्व पार्षद शंकर विश्नानी ने बताया कि यह शिवलिंग भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौर की यादें जुड़ी हुई वस्तु है। उन्होंने कहा कि बंटवारे के समय उनके पूर्वज सीताराम मोटवानी ने यह शिवलिंग सिंध प्रांत से लेकर भारत लाया था और तब के कठिन हालात में पूजा-पालिका को लेकर कई चुनौतियां थीं।
स्थापना और समाजिक जुड़ाव
कहा गया कि विभाजन के समय कई सिंधी परिवार अपनी जमीन, व्यापार और संपत्ति छोड़कर आए थे और मुश्किल हालात में यह प्रश्न उठा कि शिवलिंग की पूजा कैसे जारी रखी जाए। कुछ ने गंगा में प्रवाहित करने का विचार भी किया था, लेकिन काशी के विद्वानों ने आग्रह किया कि इसे गंगा किनारे किसी मंदिर में स्थापित कर दिया जाए।
स्थानीय लोगों के आग्रह पर सिंधी समाज ने शिवलिंग उन्हें सौंप दिया और गंगा किनारे निर्धारित स्थान पर इसकी स्थापना करवाई गई। तब से यहां विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना होती आ रही है और यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा हुआ माना जाता है।
पिछले दिनों इस स्थान पर ‘पाकिस्तानेश्वर महादेव’ नाम का फ्लेक्स लगाया गया था। सिंधी समाज के लोगों ने इसे हटवाने और कार्रवाई की मांग करते हुए नगर निगम में अपर नगर आयुक्त विनोद कुमार गुप्ता को ज्ञापन दिया था।
सिंधी समाज ने 8 अक्तूबर की कार्यकारिणी बैठक में इस मंदिर का नाम ‘सिंधु गंगेश्वर महादेव’ करने का प्रस्ताव देने का निर्णय लिया है। नगर निगम अधिनियम के अनुसार कार्यकारिणी की बैठक से 48 घंटे पहले प्रस्ताव देना अनिवार्य है। चूंकि दो अक्तूबर को नगर निगम बंद था, इसलिए प्रस्ताव उन्हें अगले दिन यानी 3 अक्तूबर को सौंपना था।
– राजकपूर चौधरी अजय, सपा कार्यकारिणी सदस्य, नगर निगम
स्रोत: अमर उजाला

