प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 3 अक्टूबर 2026 को पारिवारिक अदालत द्वारा भरण‑पोषण के आदेश में हर साल 10 प्रतिशत बढ़ोतरी के प्रावधान को सही ठहराया। यह आदेश न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की एकलपीठ ने राकेश कुमार की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर दिया।
पारिवारिक अदालत ने पत्नी की ओर से दायर आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पति राकेश कुमार को आवेदन की तारीख से 3,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था। साथ ही निर्णय की तारीख से 4,000 रुपये प्रति माह भरण‑पोषण देने के निर्देश दिए गए। अदालत ने यह भी कहा कि इस राशि में हर वर्ष 10 प्रतिशत की दर से स्वतः वृद्धि होगी।
हाईकोर्ट का तर्क
पति ने यह वृद्धि अवैध और अनुचित होने का दावा करके हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। राज्य सरकार और पत्नी के वकील ने इसके खिलाफ नहीं बल्कि समर्थन में दलील दी और कहा कि यह कदम फाइलों के चक्कर और मुकदमों की संख्या कम करने में मदद करेगा।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों के बाद देखा कि निर्धारित 4,000 रुपये मासिक केवल बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त हैं। अदालत ने कहा कि सामान्य अनुभव के अनुसार महंगाई लगभग 10 प्रतिशत सालाना बढ़ रही है, जबकि भरण‑पोषण की राशियाँ वर्षों तक स्थिर रहती हैं जिससे आश्रितों को परेशानी होती है।
कोर्ट ने पारिवारिक अदालत के इस विचार को नवाचार बताते हुए उसकी प्रशंसा की और कहा कि ऐसे ठोस कारण नहीं हैं जिनसे ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप किया जाए। इसलिए उच्च न्यायालय ने पारिवारिक अदालत का आदेश बरकरार रखा।
यह फैसला उन मामलों में मिसाल बन सकता है जहाँ स्थायी भरण‑पोषण राशि को महंगाई के अनुकूल नहीं बनाया गया हो।ffected पक्ष आगे उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार ही कार्रवाई करेंगे और आदेश लागू हो जाएगा।
स्रोत: अमर उजाला

