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रामपुर: खासबाग पैलेस से पातालेश्वर तक, जिले की विरासत और 17 हजार पांडुलिपियाँ

रामपुर में 205 कमरों वाले खासबाग पैलेस, नौवे नवाब की निजी रेलवे लाइन और 17 हजार दुर्लभ पांडुलिपियाँ इसे अध्ययन व तीर्थस्थान बनाती हैं।

रामपुर: खासबाग पैलेस से पातालेश्वर तक, जिले की विरासत और 17 हजार पांडुलिपियाँ
फोटो: अमर उजाला

रामपुर। रामपुर जिला सिर्फ नवाबी इतिहास का केन्द्र नहीं है, बल्कि यहाँ धार्मिक, ऐतिहासिक और आधुनिक विरासतें भी मौजूद हैं जो इसे अलग पहचान देती हैं। शहर में मौजूद शाही महल, प्राचीन मंदिर और अद्वितीय पुस्तकालय पर्यटन व अध्ययन दोनों के लिहाज से अहम हैं।

शाही महल और बाग

खासबाग पैलेस को एशिया का पहला वातानुकूलित शाही महल माना जाता है। यह महल 55 एकड़ में फैला है और इसमें 205 कमरे हैं। निर्माण उन्नीसवीं सदी में शुरू होकर 1930 में पूरा हुआ था। महल में इटालियन संगमरमर, म्यांमार की सागौन लकड़ी और बेल्जियम के झूमर इस्तेमाल हुए हैं और यहाँ नवाबों के लिए सिनेमा हॉल, म्यूजिक रूम व बॉलरूम भी थे।

शाहबाद के लक्खीबाग में नवाबों के समय लगवाए गए लगभग 1 लाख आम के पेड़ों के कारण यह प्रसिद्ध है। यह बाग शाहबाद तहसील में लगभग 230.65 एकड़ में फैला है। बाग में नवाबों की एक पुरानी कोठी भी मौजूद है। दूसरी ओर बेनजीर कोठी शाही जीवनशैली की याद दिलाती है, पर अब वह जर्जर हालत में है और यह संपत्ति विवाद का हिस्सा बनी हुई है।

धार्मिक स्थल और पठन‑पाठन

रामपुर के धार्मिक केन्द्रों में भमरौआ का पातालेश्वर महादेव मंदिर प्रमुख है। यह रामपुर मुख्यालय से 8-10 किमी दूर है और स्वयंभू शिवलिंग के लिए जाना जाता है। सावन और महाशिवरात्रि पर यहाँ लाखों कांवड़िये जल चढ़ाते हैं और विशाल मेला लगता है। रठौंडा गांव का प्राचीन शिव मंदिर भी लोक आस्था का केन्द्र है, जहाँ फाल्गुन की महाशिवरात्रि में मेला लगता है।

पीपली धाम या बाल सुंदरी मंदिर मिलक खानम क्षेत्र में स्थित है। यहाँ मां बाल सुंदरी की स्वयंभू पिंडी मानी जाती है और चैत्र व शारदीय नवरात्रों में हजारों श्रद्धालु आते हैं।

रजा लाइब्रेरी में करीब 17 हजार दुर्लभ पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं, जो रामपुर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान देती हैं।

नवाब रेलवे स्टेशन भी जिले की खास धरोहर में गिना जाता है। नौवें नवाब हामिद अली खान ने 1889-1930 के दौरान अपनी रियासत के लिए यह निजी स्टेशन और रामपुर से मिलक तक 40 किलोमीटर लंबी निजी रेल लाइन बनवाई थी। आज संपत्ति विवाद और देखरेख के अभाव में यह स्टेशन बंद है। एक आकलन के अनुसार इस निजी स्टेशन का बाजार मूल्य करीब 100 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया है।

ये ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल न केवल स्थानीय संस्कृति को समृद्ध करते हैं, बल्कि पर्यटन और शैक्षिक शोध के लिए भी सम्भावनाएँ खोलते हैं। प्रशासन और स्थानीय लोग यदि इन धरोहरों की मरम्मत व संरक्षण पर काम करें तो रामपुर पर्यटन मानचित्र पर और भी आगे बढ़ सकता है।

स्रोत: अमर उजाला

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Alok Kumar

Alok Kumar

कई वर्षों से समाचार, योजना, रोजगार इत्यादि मामलों से जुड़े कार्यों में संलग्न।