प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अल्प शिक्षित कर्मचारी की ओर से अपील दाखिल करने में जो देरी हुई और लापरवाही दिखी, उसे नजरअंदाज किया जा सकता है। न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने शाहजहांपुर निवासी राज कुमार की याचिका स्वीकार कर ली है और 26 जुलाई 2023 के आदेश को रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने अपीलीय प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि वह मामले का नया परीक्षण करे और केवल देरी के आधार पर अपील खारिज न करे, बल्कि अपील के गुण-दोष के आधार पर निर्णय ले। याची की वेतनवृद्धि 16 मई 2011 को स्थायी रूप से रोक दी गई थी और निंदा प्रविष्ट की गई थी।
जांच और आरोप
विभागीय जांच में याची पर कुल तीन आरोप लगाए गए थे जिनमें से दो आरोप साबित नहीं हुए। तीसरा आरोप गांव कुआबोझ में नियमित सफाई नहीं करने से जुड़ा था। याची ने इसे खंडित करते हुए कहा कि वह नियमित सफाई करता था और गांव के लोग तथा ग्राम प्रधान ने भी उसके पक्ष में बयान दिए थे।
जांच अधिकारी की रिपोर्ट में भी उस आरोप के स्पष्ट रूप से साबित होने का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं था, फिर भी दंड के तौर पर उसकी वेतनवृद्धि रोकी गई। याची ने करीब 12 साल दो महीने बाद नौ जुलाई 2023 को अपील दाखिल की थी, जिसे अपीलीय प्राधिकारी ने देरी और लापरवाही का हवाला देकर खारिज कर दिया था।
हाईकोर्ट ने समान स्थितियों में मुन्नी देवी के मैटर का उदाहरण दिया, जिसमें अदालत ने करीब 12 साल आठ महीने बाद की अपील को माफ कर, अपीलीय प्राधिकारी को गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने को कहा था और उनकी रोकी वेतनवृद्धि बहाल कर दी गई थी।
कोर्ट ने आज कहा कि वर्तमान मामले में भी जांच रिपोर्ट के अनुसार आरोप सिद्ध नहीं हुए थे और याची एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी यानी सफाईकर्मी होने के कारण पर्याप्त रूप से शिक्षित नहीं है। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपील दाखिल करने में हुई देरी को माफ करना उचित है।
अब मामले में अपीलीय प्राधिकारी को नए सिरे से आदेश पारित करना होगा और तय करना होगा कि दंड की प्रक्रिया जारी रहेगी या नहीं। प्रभावित कर्मचारी और ग्राम स्तर पर रहने वाले लोग इस आदेश को लेकर राहत महसूस कर रहे हैं।
स्रोत: अमर उजाला

